पत्रकार और Metro वाला प्यार

मेट्रो में प्यार के इतने बीज अंकुरित हो रहे होते हैं, कि कभी-कभी समझ में नहीं आता कौन सा वाला पेड़ बनेगा ? आज किसी तरह से मेट्रो के अंदर एडजस्ट हुआ तो गेट पर आखिरी मैं ही था। इतने में पीछे से एक देहाती से लुक और भाषा वाले अंकल आए और कहा 'थोड़ा अंदर हो जइओ'। इतना कहते ही मेट्रो के दरवाजे बंद हो गए और उनका धड़ जो बाहर ही रह गया था उसने अपने हाथ खींच लिए। मेरे मुंह से निकल ही गया, 'और जवाब मेट्रो ने दे दिया'।

एडजस्ट होते वक्त मैं अपना बैग आगे की तरफ लटका लेता हूं। किसी भी अनहोनी से खुद को बचाने के लिए। अरे भई हंसो मत, करना पड़ता है। मेेरे आगे वाली लड़की ने पलटकर देखा, और फिर बैग है, देखकर आगे को मुंह कर लिया।

खैर, यमुना बैंक स्टेशन आया, और नम आंखों से एक खूबसूरत लड़की ने अपने मित्र को इस बेरहम भीड़ भरी मेट्रो के हवाले कर दिया। देखकर ही लग रहा था कि लड़की कुछ और 'गुड़ टाइम इन मेट्रो लाइन' बिताना चाहती थी। पर ऐसा हो ना सका। लड़का मेट्रो में सवार हो गया। मैं थोड़ा अंदर आ गया था, औऱ मेरी वाली जगह उस लड़के ने घेर ली।

लड़के का फोन बजा, उसने देखा और काट दिया। शक्ल से काफी टेंशन में दिख रहा था। दोबारा भी काटा।
फिर तीसरी बार फोन बजा, तो फोन उठाते ही बोला, 'क्यों कर दिया ना तुझे फोन उसने ?' अब मेेरेे मन ने अंदाजा लगा लिया। जैसे कि अभी आपने लगाया। जी हां ये लड़के के दोस्त का फोन था।  फिर लड़का लगातार एक ही सांस में सबकुछ कहता चला गया।

अब आए ना फोन तो मत उठाइयो यार
मेरा ही दिमाग खराब है, जो उसे सारी बात बता देता हूं
पीछे ही पड़ गई यार
समझाने पर समझती कहां है
अब फिर रवि से बात नहीं करने की कसम देने लगी
अरे यार दोस्त का साथ तो देना ही पड़ता है
मुझे उसे ये बात बतानी ही नहीं चाहिए थी
अब.. अब क्या.. रो रही है वहां बैठ कर.. यमुना पर (यमुना बैक रहा होगा उसका मतलब)
अबे तो वहीं बैठा रहता क्या, एक घंटा हो गया समझाते हुए
ऑफिस से लगातार फोन आ रहा था, लेट हो गया यार.. बॉस नौकरी से निकाल देगा
दिन खराब हो गया साला, अब मत उठाना उसका फोन, समझ गया ना
टंसुए गिरा रही है मेट्रो स्टेशन पर, हद है यार

आखिरी वाली लाइन उसने बोली ही थी, कि वो शुरुआत वाली लड़की याद है ना, अरे यार ऊपर मत स्क्रॉल करो। अरे जो मेरे आगे खड़ी थी, हां वही। क्यूट सी शक्ल थी उसकी, अपने हाथों पर वैक्स का निरीक्षण कर रही थी। उसने अपने चश्मे के पीछे से उसे घूर कर देखा। जैसे कह रही हो, कमीने ये बात कोई इतना चिल्ला कर करता है ? फिर दोबारा अगले ही क्षण, उस अबोध बालक को माफ कर अपने नेलपॉलिश का मुआय़ना करने निकल पड़ीं उसकी आंखें।

मैंने गौर किया, उस लड़की के हाथ में भी दो फोन थे, एक बड़ा वाला, सहला कर बात करने वाला। अरे भई टच फोन। सोशल रहने के लिए जरूरी उपकरण। दूसरा वाला, छोटा सा सफेद फोन। जो चीख-चीख कर बता रहा था, कि सबसे ज्यादा जुल्म उसी पर होते हैं, वही भीगता है, आंसुओं और पुचकारों से.. वही बिखरता है.. अपनी मालकिन के साथ.. हालांकि वो मालकिन के गुस्से से बिखरता होगा, और फिर जुड़ जाता है, जैसे हर दिल का रिश्ता.. हमेशा जुड़ा ही रहता है।

इतने में फिर लड़के का फोन बजा, अबकी बार उसने कहा कि,

मेट्रो में हूं, नहीं.. अभी तक नहीं पहुंचा अभी 2 स्टेशन बाद है।

हां भई, आपका अंदाजा ठीक है। उसी का रहा होगा। लड़कियां होती बहुत केयरिंग हैं और अगर आपसे प्यार हो, तो फिर आपकी हर सजा माफ।

इतने में मुझे याद आया, कि भइया मेरा ऑफिस का स्टेशन अगला है। बस उतरकर, जल्दी-जल्दी पहुंचा, कि कहीं ये कहानी दिमाग से मिस न हो जाए।

अब ये सिलसिला चलाएंगे। पत्रकार की नजर से.. मेट्रो वाला प्यार

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