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सफरनामा.. रेलगाड़ी और शिरडीवाले बाबा के दर्शन

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कारण कुछ भी हो, भोले के दरबार जाने का जैसे ही मौका मिलता है, मैं निकल लेता हूं। कुछ वैसा ही हुआ जब मेरे दोस्त ने बताया कि वो अपने परिवार और और दोस्त के साथ महाराष्ट्र की यात्रा पर निकलने वाला है। उसने बताया कि शिरड़ी धाम के अलावा वो लोग त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के लिए भी जाने वाले हैं। अपने आराध्य से मिलने को मेरा मन भी आतुर हो गया और मैं अपनी दोस्त के साथ जाकर टिकट काउंटर से वेटिंग रेल टिकट ले आय़ा। पीआरओ के पास टिकट कन्फर्म कराने का बंदोस्बत कराने भी पहुंच ही गया। अलबत्ता जाते हुए एक ही बर्थ पर दोनों को लेटकर जाना पड़ा और आते हुए का कन्फर्म हुआ भी तो वो किसी काम का रहा नहीं, क्योंकि लगभग आधी गोवा एक्सप्रेस खाली थी। ऐसा लगा गोवा से आने वाले यात्री फिलहाल कुछ दिन के लिए नहीं लौटने वाले। खैर ट्रेन दोपहर की थी इसीलिए अपन ऑफिस से ही अपना बोरिया-बिस्तरा लेकर निजामुद्दीन स्टेशन पहुंच गए। ट्रेन में बैठने से पहले ही रजनीगंधा की दुकान से कई रजनीगंधा लाने का ऑर्डर मिला, सो लेकर पहुंच गया ट्रेन के अंदर। सफर 21 घंटों का था बहरहाल पूरा बंदोबस्त किया गया था। शाम तक मस्ती की और फिर च...

लव इन ATM लाइन

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ब्लैकमनी पर मोदी की सर्जिकल स्ट्राइक से कई नेता और कई कालाधनकुबेर परेशान हैं। डर के मारे, हर एक रेसिस्ट हो गया है और रंगीन नोटों को कालेधन से सफेद करने के जुगाड़ में जुट गया है। हालांकि इस दौरान गली के कुछ लौंडों और गरीब-मजदूरों के दिन भी फिर गए हैं। मजदूरों की इस दौरान चांदी हो गई है, उन्हे भी अब समझ में आ गया है कि आधार कार्ड बनवाने को सरकार क्यों कह रही थी। कल तक जो लात मारते थे वो आज बुला बुलाकर कमीशन दे रहे हैं, नोट बदलवाने के लिए। ये तो थी मेन स्टोरी, लेकिन इससे ज्यादा अहम है कई साइड स्टोरीज। जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण होती है किसी भी वक्त पर चल रही लव स्टोरी। क्योंकि वो उस दौर के असली इमोशन रायते की तरह फैला देती है। पेश है सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान पनपे कई गुलशनों का एक पिंक दो हजार के नोट वाला सच। पहले मोहल्ले के लड़के बिजली जाने का इंतजार करते थे, फिर दौर आया ब्लैंक कॉल का, उससे आगे बढ़े तो मिस कॉल तक मामला पहुंचा और अब फेसबुक से ढूंढ कर व्हट्स ऐप पर चोंच भिड़ाने का चलन है। कालेधन के खिलाफ इस मुहिम ने गली के सभी लौंडों को घर से बाहर आवारागर्दी का एक सुहा...

जहर हवा में नहीं, सोच में है

पीठ पर ऑक्सीजन सिलेंडर और इन सिलेंडरों से निकलकर मुंह पर एक खास तरह के हेल्मेट से बांधे हुए मास्क के साथ बाइक-स्कूटर चलाते लोग। कार, बस और मेट्रो में ऑक्सीजन की पर्याप्त व्यव्सथा। गरीबों के लिए सब्सिडी में 50 प्रतिशत सस्ते ऑक्सीजन सिलेंडर। एक सरकारी स्कीम के तहत बीपीएल कार्ड धारकों के लिए प्रधानमंत्री सांस योजना के तहत 0 प्रतिशत इंटरेस्ट रेट के साथ कुछ सिलेक्ट जगहों पर बेची जा रही ‘ शुद्ध सांस ’ की पूरी किट के साथ सिलेंडर। पीएम की चाहत, कि गरीबों को भी अमीरों जैसी ऑक्सीजन से भरपूर सांस लेने की आजादी हो। वहीं कुछ नामी-गिरामी कॉलेजों में पीएम की इस योजना के खिलाफ आंदोलन। दीवली बाद से हुए प्रदूषण और अंधेरे से निबटने के लिए आनन-फानन में केंद्र सरकार ने मीटिंग कर देशभर में अंधेरा छंटने तक बिजली माफ करने का एलान किया। दिल्ली के सीएम ने इस अंधेरे के लिए केंद्र सरकार की नीतियों को दोषी ठहराया। बाबा ने लॉन्च किया फेफड़ो को ताकतवर बनाने का नया हर्बल प्रॉडक्ट। अमेरिकी डॉक्टरों को मिली बड़ी कामयाबी, रिवर्स लाइफ टेस्ट में सफल साइंटिस्टों ने लैब में पैदा किया एक ऐसा टेस्ट ट्यूब बेबी जिसे जीने ...

बच्चे भगवान का रूप होते हैं.. लेकिन अपने

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सड़क पर नंग-धड़ंग बचपन की धुन में मलंग, मिट्टी और मैल से लिपटे तन से झांकती पसलियों के साथ, एक हाथ में सफेद कपड़ा लिए, दूसरे हाथ को फैला कर भीख मांगते बच्चों को देखकर दिमाग में कई विचार एक साथ मल्लयुद्ध करने लग जाते हैं। अगले दस सेकेंड बाद किसको कार में रखा बिस्किट दिया जाए या ना दिया जाए का फैसला जीता हुआ विचार होता है। लेकिन लाल बत्ती खत्म होने के बाद, हर बीतते दिन के साथ अर्जित की हुई ज्ञान की परत को हारे हुए सभी विचार मैल साबित करने पर तुल जाते हैं। ये तस्वीरें और वाकया आज शाम का है। जैसे ही रामा कृष्णा आश्रम मार्ग मेट्रो स्टेशन से मैं लौटने को हुआ, वहां खड़े स्ट्रीट फूड खाते मेरे कुछ दोस्तों ने मुझे अपने साथ खाने का निमंत्रण दिया। खड़े होते ही मेरे पैर से ये चेक शर्ट वाला बच्चा आकर लिपट गया और दस रुपए देने की जिद करने लगा। जिसे फिर मेरे दिमाग में जीते हुए एक विचार ने डांट कर भगा दिया। बच्चे को भगाने के तुरंत बाद बाकी बचे विचारों ने अपनी आदत के मुताबिक मुझे कोसना शुरू कर दिया। आज का ये ब्लॉग उन्ही विचारों की गालियों का नतीजा है। अब अपनी वैचारिक और माली गरीबी पर शर्...

मेसेज भेजना बंद कर दो

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गए दिनों की बातें हो गई हैं, जब मिल बैठते थे तीन यार। दारू की बात नहीं, दिल की बात करने को, दारूबाज तो आज भी मिल लेते हैं। लेकिन आजकल तो हर रिश्ते और हर त्योहार का बंटाधार इस इंटरनेट पर मौजूद फ्री मेसेज सेवा ने कर डाला है। जन्मदिन हो, त्योहार हो या फिर कोई बुरी खबर हो। संवेदनाएं, बधाई या फिर शुभकामनाएं सिर्फ एक मेसेज बन कर रह गई हैं। किसी दोस्त की टांग टूट गई हो तो उसके घर जाने की बजाए उसकी फेसबुक पर टूटी टांग वाली फोटो पर ऑऑऑ लिखकर सारा हालचाल उसी पर पूछ लिया जाता है। टूटी टांग वाला भी अब ऑनलाइन साइट और मेसेज सर्विस से मिलने वाली संवेदनाओं को ही रिअल मानकर काम चला लेता है।  कई झगड़े तो केवल इसी बात पर हो जाते हैं कि मैंने तुम्हे मेसेज भेजा पर नीले टिक होने के बाद भी तुमने उसका जवाब 2 घंटे बाद क्यों दिया ? आखिर ऐसा क्या जरूरी काम था जो पढ़ने के बाद 20 सेकेंड का जवाब टाइप करने का भी समय नहीं मिला। वैसे ये मेसेज सर्विस इमोशंस को सप्लाई करने के लिए इमॉटिकॉन्स नाम की चीजों से भरी पड़ी है। ऑनलाइन साइट्स पर तो इनसे भी आगे शोले के गब्बर और बसंती से लेकर विदेशी मॉडलों की शक्...

बर्फ़ हुई संवेदना, ख़त्म हुई सब बात....

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वर्चुअल वर्ल्ड में फ्रेंड लिस्ट की हदें पार कर दूसरा फेसबुक अकाउंट बनाने या फिर पेज बनाने को मजबूर हो चुके कई सोशल बटरफ्लाइज़, आखिर डिप्रेशन में आकर खुदकुशी क्यों करने लगे हैं ? कहीं इसकी वजह  हम ही तो नहीं ?  ज्यों-ज्यों हम बुद्धिजीवी विकसित होते जा रहे हैं, ऐसा लगता है रोबॉटिक भी होते जा रहे हैं। दोस्त के साथ लगाए जाने वाले ठहाके अब :) ऐसे इमोटिकॉन बन चुके हैं, बुरी खबर पर फोन करके या मिलने जाने की जगह फेसबुक पर RIP लिखकर नेगेटिविटी से पल्ला झाड़ने या फिर संवेदना प्रकट करने का चलन है। मानों सबके अंदर से इमोशन नाम की चीज खत्म होती जा रही है। क्या ये हमारे इवॉल्यूशन का अगला लेवल है ? ज़रा अपने आस-पास गौर से देखिए, कितने लोग हैं जो आपके लिए कभी भी कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। बशर्ते आप बॉस नहीं हों, क्योंकि अगर ऐसा होगा तो आपके पास मक्खन लगाने वालों की फौज होगी। जब आप सच में इस सवाल का जवाब एकदम निष्पक्षता से ढूंढेंगे, तो पाएंगे कि आपके एक-दो दोस्तों को छोड़कर बाकी कोई नहीं। हालांकि आपका जवाब, घर पर आपका परिवार भी हो सकता है। किंतु थोड़ा और आगे चलकर ...

आपका मोबाइल फोन जहरीला है ?

इस युग में जब हममें से कई लोग बिना फोन के जिंदगी सोच भी नहीं सकते। जब मोबाइल केवल फोन न रहकर कैमरा, चलता-फिरता कंप्यूटर, सूचना और मनोरंजन का साधन और शिशुओं की मांओं के लिए रोते हुए या परेशान कर रहे बच्चे को चुप कराने या ध्यान बंटाने की रामबाण दवा भी बन गया है। ऐसे में विदेशों में हुआ ये शोध कान खड़े कर देने वाला है। फोन खरीदने से पहले बैटरी लाइफ, बैटरी पावर, बैटरी कितनी देर तक फुल चार्ज करने के बाद चलती है, ये सभी सवाल हम जरूर पूछते हैं। पर इसे पढ़ने के बाद कौन से बैटरी है, इस पर भी आप ध्यान जरूर देने लगेंगे। ये सुनकर चौंकना लाजमी है, लेकिन ये पढ़कर आपको अपने फोन से दूर रहने की कई वजहों में से एक और वजह आज मिल जाएगी। एक रिसर्च के मुताबिक हो सकता है कि आपके मोबाइल फोन में लगी बैटरी जानलेवा गैस छोड़ती हो। अमेरिका और चीन में हुई एक रिसर्च से पता चला है कि मोबाइल फोन में लगने वाली एक खास तरह की बैटरी से 100 ज्यादा जहरीली गैसों का रिसाव होता है। अमेरिका के इंस्टीट्यूट ऑफ़ एनबीसी डिफ़ेंस और चीन की सिंघुआ यूनिवर्सिटी में  ‘ लीथियम आयन ’ बैटरी   पर शोध किया गया। शोध में पाय...

सबसे ज्यादा एडजस्ट तो भगवान ही करता है

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आज फुटपाथ पर भगवानों को आसरा दिए इस गरीब को देखा..  तो उसके मुंह पर सुकून के साथ.... इतने सारे बेघर-अपंग पड़े भगवानों के साथ खुद पर दया आ गई.. मन चंगा तो कटौती में गंगा.. अब गंगा भी मैली हो गई है.. औऱ साथ में मन भी.. तो फिर आस्था कैसे बचे.. वो भी हो गई.. कलियुग केवल नाम अधारा.. अब इसको कहने वाले ने तो कह दिया.. पर जैसे सबका अपना-अपना सच होता है. वैसे ही समझ भी.. औऱ समझ लगभग सभी की मतलबी होती है.. इसलिए आस्था को मन से जोड़ा गया.. लेकिन ज्यादातर लोग भगवान के साथ भी तीन-पांच करने से बाज नहीं आते.. सब्जी वाले भइय़ा.. 10 की क्यों 8 की दे दो ना.. ऐसे ही महाशिवरात्रि है.. मेरा व्रत है.. बस इतने में तो हो जाना चाहिए भगवान को प्रसन्न.. औऱ क्या.. अब जान भी ले लेंगे.. मतलब ऑफिस के साथ-साथ क्या-क्या कर लें.. जो फीजेबल नहीं है.. उसे कैसे कर लें.. जी हां.. आज ही सुना मैंने.. ऐसा नहीं है कि मैंने नहीं किया ऐसा कभी.. लेकिन सुनते ही मन ने कहा कि सच ही तो है.. महाशिवरात्रि को शिवालयों में भीड़.. शिव पर चढ़ते जल.. बेल पत्र और उन्हें प्रसन्न करने की सभी सामग्री के साथ.. उनका वंदन करते हुए क...

भगवान पर भी गुस्सा आ ही जाता है

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निजामुद्दीन की रेड लाइट पर आज ऑफिस आते हुए फिर वो मिली, मेरे अलावा एक ऑटो और था वहां, वो ऑटो तक गई औऱ मैं अपने पर्स में एक छोटा नोट टटोलने लगा। वो हर रोज की तरह मेरे पास आकर खड़ी हो गई, शीशे के पास। पर रोज की तरह भइया-भइया कह कर चहचहाई नहीं। नोट हाथ में पकड़कर जैसे ही मैं उसकी तरफ मुड़ा, मेरा दिमाग खराब हो गया। आज उसका मुंह एक तरफ से सूजा हुआ था, ऐसा जैसे किसी ने बुरी तरह पीटा हो। उसके कोमल गाल पर नीचे की दाढ़ की तरफ कान से लेकर नाक तक एक बड़ा सा उभार था।  दाईं आंख भी सूजी हुई थी, हालांकि बाहर से कोई निशान दिख नहीं रहा था, लेकिन सूजन देखकर लग रहा था कि उसके साथ कुछ बुरा हुआ है। आज एक हाथ शॉल के अंदर दबाया हुआ था उसने, कुछ बोल भी नहीं रही थी। मैंने उसको पूछा, बेटे क्या हुआ है, किसने किया है, कोई परेशानी है क्या ? वो नहीं-नहीं कहती हुई पीछे की तरफ जाने लगी। मैंने उससे कहा कि बेटे भाई बोलती हो तुम मुझे, बताओ क्या परेशानी है, अगर किसी ने पीटा है तो चलते हैं उसके पास। वो बिना कुछ बोले वहां से चली गई औऱ बत्ती हरी हो गई, साथ ही पीछे से हॉर्न की आवाज आई औऱ मैं आगे की तरफ बढ़ गया। मेरी...