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यानी.. हर तरफ मरें.. तो केवल महिलाएं

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नर से बढ़कर नारी है..दो-दो मात्राओं का भार.. स्कूल में हिंदी के टीचर शास्त्री सर ने पढ़ाया था एक बार.. तब शायद मेरा कल्पनाशील मन.. इस बात का मर्म समझने लायक गहराई में गोता नहीं लगा पाया था.. लेकिन अब.. ज्यों-ज्यों उम्र बीत रही है.. समझता जा रहा हूं.. मम्मी को हर रोज त्याग करते देखकर बड़ा हुआ.. औऱ फिर दोनों बहनों को शादी के बाद देखता.. प्रैक्टिकली सीख रहा हूं.. महिलाएं हम पुरुषों से हर तरह से दोगुने से ज्यादा सामर्थ्वान हैं.. इस बात को हर बड़े विचारक.. राजनीतिज्ञ औऱ स्वयं भगवान भी मान चुके हैं... शिव ने जहां पार्वती की तुलना प्रकृति से करी.. तो वहीं महान चाणक्य ने भी महिलाओं के सामर्थ्य का गुणगान करते हुए कुछ पंक्तियां कहीं.. इसके अलावा मां बनने की गरिमा को बताते हुए एक विचारक ने कहा था कि मां बनना महिला के ऊपर निर्भर करता है.. जबकि पिता बनने का गौरव.. महिला की इच्छा पर निर्भर करता है.. यानी.. अगर महिलाओं को हटा लिया जाए.. तो मर्दानगी गई तेल लेने.. जी हां.. सही पढ़ा आपने.. ये हर रोज़ मसल दिखाने किसे जाएंगे.. और वो वंश बढ़ाने वाले आपके चिराग.. वंश आगे बढ़ाएंगे कैसे... लड़की को ...

दिल्ली की सर्दी..चुनाव.. और हवाई फायरिंग

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    दिल्ली का मौसम बदलने लगा है.. सर्द हवाओ के साथ दिल्ली की फिजा में चुनावी गर्माहट का एहसास होना शुरू हो गया है... नवंबर की गुनगुनी ठंड अपने साथ दिल्ली में चुनाव का ऐलान लेकर आई है.. और चुनावी बिगुल की आवाज सुनते ही.. सियासी शेरो की दहाड़ कानों में पड़ने लगी है... कयासों की जगह अब बयानों ने ले ली है.. लेकिन.. इन सियासी तीरंदाजों के सामने फिलहाल एक बड़ी दिक्कत आन पड़ी है.. दिक्कत है.. कि आखिर ये बयानों के बाण मारें तो किसको... आम आदमी पार्टी के अऱविंद केजरीवाल सर्दी आते ही अपने मॉफलर को संभाल.. बयानों के तीर चलाना शुरू कर दिया है.. लेकिन.. सामने ना तो बीजेपी औऱ ना ही कांग्रेस का कोई निशाना फिलहाल दिखाई पड़ता है.. ऐसे में आम आदमी पार्टी ने अपने हिसाब से अपना प्रतिद्वंद्वी चुनकर हमले करना शुरू कर दिया है.. आप के निशाने पर नहीं बीजेपी के खास आम आदमी के निशाने पर बीजेपी का खास आदमी नहीं है.. आप के निशाने पर है.. जगदीश मुखी... और आम आदमी पार्टी की दलील है कि दिल्ली विधायक दल का नेता होने के नाते मुखी ही दिल्ली में उनके प्रतिद्वंद्वी हैं.. लेकिन.. बयानों के इस बाजार में...

जब अपनी हंसी पर रोना आया

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पतला लंबा शरीर.. चाल में हल्की सी लड़खडाहट लिए.. मेरी तरफ पीठ करके वो मेरे बगल वाली गाड़ीवाले से शायद कुछ कह रही थी.. जब मेरी नजर उसपर पड़ी... मैंने अभी उसे देखा ही था.. कि पलक झपकते ही वो काया मेरी तरप मुड़ी... फिर उसके बाद जो मैने देखा.. वो कुछ ऐसा था... फैली हुई लिप्सटिक.. फैला हुआ काजल... हल्का ढ़ला हुआ सा दुपट्टा... आधा मुंह को ढंके, आधा सिर के ऊपर... लड़खड़ाता हुआ वो शरीर मेरी ओर मुड़ा... फिर मेरी कार की खिड़की पर हाथ मारते हुए उसने मुझसे पैसे मांगे.. उसके हाथ में कुछ नोट औऱ भी थे... लेकिन उसकी शक्ल देखकर उस पर दया आने की बजाय मुझे हंसी आ गई.. औऱ ठीक उसी वक्त जब वो मेरी तरफ हसरत भऱी नजरें लिए.. शायद नशे की औऱ हल्की होश की हालत में... मैं इस वेश में किन्नर बनकर धन उगाही के चक्कर में लगे नशे के आदी उस पुरुष की व्यर्थ कोशिश को देखकर अपनी हंसी रोक नहीं पाया... हंसी उसके खुद को किन्नर साबित करने की कोशिश में किए गए फैले हुए उसके मेकअप को लेकर थी.. कनॉट प्लेस में हर रोज कंबलों के नीचे इक्टठा होकर समूह में स्मैक पीने वाले इन नशेड़ियों को देखने वाले आप सब समझ गए होंगे कि ...

बचाओ !

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पिछली बार हुए केदारनाथ हादसे के बाद जनता , मीडिया और सरकार का ध्यान पहाड़ों की परेशानियों की तरफ गया है। ऐसा नहीं है कि पहले से वहां विकास के काम नहीं हो रहे , लेकिन जो हो रहे हैं वो बेहद नाकाफी औऱ कम क्वालिटी के हैं। प्रकृति पर मानव की मार का बदला कहा जाए या फिर दैवीय आपदा , लेकिन केदारनाथ हादसे से सभी आज तक घायल हैं। वो जिनके परिवार वाले उस आपदा का शिकार हुए , वो जो उन्हे बचाने में शहीद हुए , वो जिन्हे वहां बार-बार दौरा करने जाना पड़ता है , वो जो मारे गए लोगों की गिनती को कम करके दिखाने की टेंशन में घुले चले जा रहे हैं , वो नेता जो लाशों पर सियासत कर रहे हैं और वो भी केदारनाथ दर्शन की इच्छा रखते हैं। डर सबके मन में हैं , कहीं फिर से किसी और पहाड़ी तीर्थस्थल पर ऐसा हो गया , तो क्या होगा ? लेकिन क्या कभी उन लोगों के बारे में सोचा जो पहाड़ों को बसाए हुए हैं। हां हां माना कि अब आपके मन में ये आएगा कि ये खुद पहाड़ी है तो पैरवी करने लगेगा , लेकिन सच ये है कि मेरे अलावा और कौन बताएगा। मैं केदारनाथ त्रासदी की बात नहीं करना चाहता , लेकिन आप ये बताइए , कि केदारनाथ औऱ उसके अलावा पहा...

रक्तदान... निकाल ली जान !

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वैसे तो 7 बार रक्तदान कर चुका हूं.. और ये आठवीं बार था, लेकिन इस बार का किस्सा सबसे अमेजिंग है। ऑफिस पहुंचकर अपने प्रोग्राम में पिला हुआ था कि इतने में मेरे एक भाई का फोन आया। पहले तो नाम देखकर असमंजस हुआ, क्योंकि भाईसाहब साथ में काम करते हुए भी इतने बिजी हो गए हैं, कि आजकल तो दर्शन ही दुर्लभ हैं। उसपर उनका समय निकाल कर मुझे फोन करना.. ओहो.. ये तो कयामत हो गई। खैर फोन उठाकर नमस्ते करते ही ऑर्डर मिला कि एक दोस्त की बीवी की तबीयत बिगड़ गई है औऱ उन्हे खून की जरूरत है। तो अब बीच का मामला कट करके हम निकल लिए खून देने के मिशन पर। किसी तरह पूछते-पाछते मैं पहुंचा स्टीफन अस्पताल और फिर पहुंच गया महिला पोस्ट ऑपरेटिव वाले कमरे में, वहां पुहंच कर मरीज का नाम बताया तो वो वहीं मिल गईं। काफी कमजोर लग रही थीं वो औऱ दर्द से लगातार कराह रहीं थीं। नमस्कार के जवाब में मैनें भी नमस्कार किया और परिचय का आदा-प्रदान हुआ। उनकी कराह सुनकर बस मन में लगातार उनके लिए प्रार्थना चल रही थी। उनसे बात हुई तो मैने ढांढस बंधाते हुए कहा कि ‘आप जल्दी ठीक हो जाएंगी’, इसपर मां के ह्रदय से आवाज आई कि ‘भइया बस वो ठीक रहे...

अंत में अनंत का आभास है श्मशान

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“ देखकर खुद को फिरे है इतराता             ख़ुदा तेरी मिट्टी में खुदी कितनी है ”                       निगमबोध घाट पर चिताओं को जलते देखकर कई तरह की बातें मन में आ गईं। जिसे न पसंद हो न पढ़े। पर , साझा करने का मन है। जितनी बार श्मशान से लौटता हूं , सब झूठा लगने लगता है , अपने से चालाक औऱ ज़िंदगी में मारकाट की प्रतियोगिता में पारंगत महान व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति बढ़ जाती है। क्या इनका यह फ़न चिता को चकमा देने में काम आएगा। अनंत सुख देने वाला यह जीवन , जिसमें हल्की सी ज्यादा गर्मी से पसीने औऱ गर्म चीज़ से कई दिनों तक जलन औऱ फिर जलने का दाग रह जाता है , विडंबना यह कि उस जीवन को मुक्ति का मार्ग उसी आग्नि से मिलता है , फिर आजीवन जिंदगी देने वाले पानी में डूबने को छोड़ दी जाती हैं बची अस्थियां। सब कुछ शांत है। शिव भी शांत बैठे हैं। आपाधापी के बीच अजीब सी शांति का अनुभव है श्मशान। कल किसी ने मुझसे औकात का प्रश्न किया , सच में सबकी औकात कुछ क्विंटल लकड़ी ही है। फिर भी बहुत कुछ चाहिए सभी...