और उसने मेरी गोद में दम तोड़ दिया.....
मुझे आज भी याद है, तकरीबन सात साल पहले जनवरी के महीने में, जब पहली बार उसको देखा, तो मन में आया कि काश ये मेरे पास होता। अब तक की ज़िंदगी में ऐसा पहली बार लगा, ये बोलकर मैं झूठमूठ ही इमोशनल लाइन नहीं जोडना चाहता। लेकिन उस प्यारे से गोलमोल छोटे सफेद रंग के भूटिया पिल्ले को देखकर, बस मन किया कि ले चलो। गांव की हसीन वादियों में स्वच्छंद विचरने पर मैं खुद को आज़ाद महसूस करने लगता हूं। मैं मूल-रूप से उत्तराखंड का निवासी हूं, जिसे उत्तरांचल ज्यादा पसंद था। प्रकुति के समीप पहुंचते ही अचानक स्वर्ग सी अनुभूति होने लगती है। बरबस ही मन होता है, कि काश.... इस मनोरम अहसास का एक हिस्सा मैं अपनी राजधानी की आपाधापी के बीच ले जा सकूं। पर कुछ चित्रों और अपनी दिमाग़ की नसों में समेटी कुछ यादों के सिवा ले जा नहीं पाता था। तो इस बार मौका मिला, और मैं अपनी जैकेट के अंदर उस कुत्ते के पिल्ले को डालकर चुपचाप अपनी गाडी तक चल दिया। मैं जानता था, कि कुत्ता शब्द से ही घर में भूचाल आ जाता है, तो फिर गांव से एक कुत्ते को घर तक ले जाने की इजाजत तो मुझे स्वयं भगवान भी नहीं दिला सकते। मम्मी को कुत्तों...