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मोदी जी, जरा 1 मिनट देंगे Please

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उधमपुर हमले में देश के दो होनहार शहीद हो गए.. उनकी चिताओं पर मेले लगे भी और आगे भी लगेंगे.. पर संसद में उनके अदम्य साहस औऱ शौर्य की गाथा के बाद  वीरता पुरस्कार की  घोषणा करने वाले आपके राष्ट्रभक्त मंत्री महोदय कहां गायब हो गए ? क्या बुनकर दिवस के उद्घघाटन समारोह में आपके तेजस्वी भाषण से गदगदाई भीड़ की तालियों की गूंज, आपके खुद के चुनावी भाषण की आवाज को आपके जहन से  मिटा गई.. जब आपने कर्ज से मरते किसानों और घाटी में शहीद होते जवानो का जिक्र करते हुए कहा था, 'सोनिया जी के राज में जय जवान जय किसान, मर जवान मर किसान' हो गया.. बुनकरों का हाल क्या है, ये तो मोदी जी आप अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जाकर देख लीजिए, कहते हैं Charity begins at home.. DG बीएसएफ ने भी अपने बयान में कहा कि अगर हमारा रॉकी न होता तो बस में बैठे 2 दर्जन जवान शायद न बच पाते.. 2 जवनों को खोकर हमने बाकी जवानों की जान बचाई..  हालांकि शहीद शुभेंदु को नमन करने खुद ममता हवाई अड्डे पहुंचीं.. पर शहीद के परिवार के सरकारी अनदेखी के सवाल, लंबा सफर तय करके मीडिया से होते होते, जब...

बाहुबली में धर्म का खूबसूरत चित्रण

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बाहुबली फिल्म का डंका चारों ओर कुछ इतना बज गया, कि मेरे भी दिमाग के सुप्त कलाकार कीटाणु, भूख से कुलबुला उठे. यहां पहले ये स्वीकार कर लूं कि मैंने फिल्म देखने से पहले उसके इफेक्ट्स की हॉलिवुड फिल्मों से तुलना सुन-सुनकर थोड़ा बायस्ड होकर सोचा था, कि बाद में देख लूंगा. फिल्म की शुरुआत चिर-परिचित साउथ वाली फिल्मों वाले अंदाज में हुई, जब एक औरत एक बच्चे को बचाते हुए महा जल प्रपात में कूद जाती है, लेकिन पूरी डूबकर भी नन्हे बालक को थामे उसका हाथ जल से ऊपर ही रहता है, औऱ उसे जल प्रपात के दूसरी ओर एक मां के हाथों में सौंपकर,  एक इशारा कर भगवत धाम की ओर निकल लेती है. कुछ-कुछ श्री कृष्ण के देवकी से यशोदा की गोद तक पहुंचने, या सूर्यपुत्र कर्ण की कथा का बेहतरीन कल्प-फिल्मांतरण. आधी फिल्म में हीरो यानी बाहुबली उस महा जल प्रपात के ऊपरी छोर में पहुंचने की कोशिश में लगा रहता है, रॉक क्लाइम्बिंग, माउंटेन क्लाइम्बिंग भूल जाइए, क्योंकि यहां बाहूबली एक काई से भरे, निरंतर तेज पानी के गिरते हुए बहाव को काटकर, अपने पिता औऱ मां का प्रतिशोध लेने पहुंच जाता है. लेकिन यहां भी फिल्मकार राजामौली की प्...

गांव मतलब दादी

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आखिरी कुछ दिनों में.. दादी हर रात मम्मी से यही पूछतीं.. पंकज आया क्या ? उनको मेंरा दाआआआआदी करके चिल्ला-चिल्लाकर बुलाना अच्छा लगता था। बचपन की कुछ यादें जो बिल्कुल ताज़ा हैं.. उनमें दादी भरी पड़ी हैं.. गांव के नाम पर बचपन का जो कुछ भी खट्टा-मीठा अनुभव है.. वो केवल दादी है.. दादी मेरी भी हर किसी दादी की तरह अपने पोते-पोतियों को बहुत प्यार करती थीं.. हमेशा गिनती करके बतातीं..  मेरे तो इतने बच्चे हैं.. गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने से पहले ही मम्मी-पापा से सवाल-जवाब शुरू हो जाते थे हमारे.. कब जाएंगे हम गांव.. मम्मी बताओ कब जाएंगे गांव.. दादी की बहुत याद हमें बस गर्मी की छुट्टियों के नाम से ही आने लग जाती थी.. गढ़वाल के पहाडों पर घुमावदार सड़कों औऱ खाइयों को झांक कर देखने से ही मुझे हर बार लगता था.. कि भगवान इस बार बचा ले.. बस को खाई में गिरने से.. अगली बार नहीं आऊंगा.. वो गंदा बस का उल्टी भरा सफर करने के बाद.. जब सड़क पर पैर पड़ते थे.. तब जाकर कहीं मेरी जान में जान आती थी.. घर से कुछ 3 पहाड़ चढ़ने उतरने पड़ते थे तब हमारे गांव पहुंचने के लिए.. बचपन में हर बार जब गांव पहुंचा.....

उल्टे रामपुर आज़म को.. कलियुग का गीता ज्ञान

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धर्म परिवर्तन के नाम पर सियासतदानों ने सालों अपनी रोटियां सेंकी हैं.. कई बार धर्म औऱ ध्रुवीकरण की राजनीति के चक्कर में निर्दोषों की जान गई है.. आम लोगों को साल के किसी भी महीने में अप्रैल फूल बनाकर.. अपना हित साधने वाले राजनीतिज्ञों को आज जनता ने गीता ज्ञान दे दिया है.. भगवा और टोपी का इस्तेमाल करने वालों को इस बार रामपुर वालों ने ऐसा पाठ पढ़ाया है.. कि आने वाले उत्ता परदेस चुनावों पर भूखे गिद्धों की पारखी नजर को अब अपना पुराना चश्मा उतार कर.. नया नजरिया अपनाना पड़ेगा.. रामपुर में समाजवादी पार्टी और उत्ता परदेस के अति महत्वपूर्ण लोगों में से एक आजम खान से खौफजदा लोगों ने अपना घर बचाने के लिए वो कर डाला.. जो शायद ही कभी राजनीति के तुर्रमखां माननीय आजम खान ने सपने में भी सोचा होगा.. खबरों के मुताबिक.. रामपुर में सालों पुरानी वाल्मीकि बस्ती के कुछ लोगों से घर खाली करने के लिए कह दिया गया था.. इनका आरोप है कि कुछ लोगों का घर केवल धर्म के आधार पर बख्श दिया गया.. रामपुर आजम खान का गढ़ है.. लिहाजा मजबूर होकर इन लोगों ने अपना घर बचाने की एक अलग कोशिश की,.. हालांकि सरकार का तर्क है कि इ...

भगवान थोड़े कहता है आकर गले लग जा

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बाहर कुछ लौंडे आपस में बात कर रहे थे.. 4 थे औऱ चारों के ही हेय़र स्टाइल अलग.. एक काफी दुबले लड़के ने दूसरे लड़के से आगे की तरफ जाते हुए पूछा.. कमांडर लाया है क्या..  उसने कमांडर सिगरेट के बारे में पूछा था... मोदी सरकार चाहे जितने जतन कर ले.. सिगरेट के पैकेट पर कैंसर पीड़ितों के फोटो लगाए या फिर सिगरेट पर ही नो स्मोकिंग लिखवा दे.. सिगरेट पीने वालों की बात ही निराली है.. बस ये समझ नहीं आता कि जो सिगरेट हर पल मौत औऱ हर दिन दूसरे सिगरेट पीने वालों से एक कश की भीख मंगवाती है..वो स्टेटस सिंबल कैसे बन जाती है.. खैर.. वो लेकर आया कमांडर.. औऱ लगा कश मारने.. फिर अपने साथ खड़े दूसरे खड़े बालों वाले लड़के से पूछा.. यार ये केदारनाथ कहां है ? पहले वाले का शरीर इतना पतला था.. कि एक टी-शर्ट के ऊपर एक खुली शर्ट पहनकर.. उसने अपना वजन बढाया हुआ था.. उसके इस अति धार्मिक सवाल को सुनकर.. मोरा पापी मन आगे ना बढ़ पाया.. मैं रुक गया.. ज्ञान की इच्छा ने दूसरों की बातें चुपके-चुपके ना सुनों की सीख को कहीं पीछे धकेल दिया.. अब जवाब सुनने की बारी थी.. दूसरे लौंडे के सिर के बाल भी खड़े थे.. पर उसक...

BBC है की मानता नहीं

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BBC की निर्भया पर डॉक्यूमेंट्री देखी, वकीलों की बातें दुखी करने वाली हैं, दोषी की बातें, दिल दहला देने वाली हैं, पर सबसे बड़ी परेशानी बीबीसी की देश को गरीब प्रोजेक्ट करने वाली आदत से है, जो इसमें भी दिखती है, भाई बीबीसी वालों, हमारे देश में पुलिसबल हाईली इक्विपड हैं, घोड़े पर बैठे दो पुलिसवाले दिखाने का क्या मकसद है इस डॉक्यूमेंट्री में आपका ? 16 दिसबंर 2012 को जो हुआ वो घटिया था, हमारा देश आत्ममंथन कर रहा है इस पर, बहुत कुछ बदलना बाकी है, बहुत कुछ बदलेगा। इस डॉक्यूमेंट्री से मानसिकता बदलने वाली बात इस हद तक सामने आ जाती है कि शायद इसे देखकर कुछ लोग अपनी सोच भी बदलें,  वकील औऱ दोषी दोनों के मुताबिक, लड़की और लड़का रिश्तेदार होने के अलावा, किसी और रिश्ते में होते हुए, रात में बाहर निकल कैसे सकते हैं?  मानसिकता बदलने का मतलब बहुत बातों से है, लेकिन बीबीसी को भी अपनी मानसिकता बदल लेनी चाहिए, हमारे देश में स्नेक चार्मर्स, बैलगाड़ी, घोड़ागाडी़ के अलावा और भी बहुत कुछ है, अपनी डॉक्यूमेंट्री में पुलिस हेडक्वॉर्टर, उसके सामने वाला भूमिगत पैदल पार पथ, ठीक सामने बहुमंज़िला डीडी...