चार कंधों की लिस्ट
किसी ने एक किस्सा सुनाया, जिसके बाद हर रोज एक ही बात सुनता हूं अपने आस-पास, 'यार चार कंधे जुटा लेना अपने लिए'। जी हां, अंदर तक झकझोर देने वाला किस्सा था, इसीलिए यहां साझा कर रहा हूं। सोचने पर आपको भी मजबूर कर देगा, कि हम किस दुनिया में जी रहे हैं, आखिर ये जो हमारे आस-पास लोग हैं, क्या ये सच में हमारे अपने हैं, या जरूरत के यार।
सोसाइटी को ही सबसे सेफ और सिक्योर माना जाता है, ज्यादातर मेट्रो सिटीज में, लगभग यही सोच सभी की है। मैं भी एक मोहल्ले में रहता हूं। जहां एक वक्त तक सभी एक दूसरे का हाल आसानी से पूछ सकते थे। क्योंकि मकान एक मंजिला ही थे, पर जैसे-जैसे मकानों की मंजिलें बढ़ती गईं, दिलों के फासले बढ़ती सीढ़ियों के साथ बढ़ते चले गए। शायद हम में से कुछ लोग इसे मानने से इनकार कर दें, तो उन लोगों को मैं बधाई दूंगा, कि यार सच में आप जिंदा हो।
खैर, सोसायटी में रहने के अपने फायदे हैं, सिक्योरिटी और अगल-बगल के लोगों के अनचाहे हस्तक्षेप से छुटकारा। जी हां, अक्सर यही सुने हैं मैंने। पर जब ये कहानी सुनी, तो ये सारे फायदे एक बुलबुले की तरफ फूट गए।
एक सोसायटी में एक व्यक्ति की मौत हो गई। अचानक मौत, दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई। घर में केवल बीवी थी। पति को होश में न देखकर उसने जल्दी घर पर फोन मिलाया। घर लगभग 1000 किमी दूर था। वहां से एंबुलेंस को फोन करने की हिदायत के साथ सहारा दिया गया कि हम बस निकलते हैं। महिला ने एंबुलेंस को फोन करने के अलावा, पति के फोन में से आखिरी डायल्ड लोगों को भी फोन मिलाया। पति के ऑफिस के दोस्त थे, लगभग चार लोगों को फोन मिलाकर जब वो हटी, तो उसके सामने केवल अंधेरा था। क्योंकि सभी के पास कोई न कोई जरूरी काम था जिसे निबटा कर वो बस जल्द ही पहुंचने की बात कर रहे थे। महिला ने लगभग एक घंटा एंबुलेंस का इंतजार किया और एंबुलेंस के साथ पहुंचे डॉक्टरों ने उसके पति को मरा घोषित कर दिया।
महिला के ऊपर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। महिला के पास एंबुलेंस को चुकाने भर के पैसे ही घर पर थे। एंबुलेंस के जाने के बाद रोते-रोते कब वो खुद भी बेहोश हो गई, ये उसे चार घंटे बाद होश आने पर पता चला। अब रात हो चुकी थी। घुप्प अंधेरे के बीच, वो और उसके पति की लाश पड़ी थी। वो पति, जो कुछ देर पहले तक उससे मजाक करने के बाद अपना काम करने के लिए बैठा था। वो, जिसके अलावा वो इस सोसायटी में किसी को जानती ही नहीं थी। अचानक उसे अपने एकदम अकेले होने का एहसास हो गया। मन में सवाल आया कि अब क्या किया जाए ?
महिला ने एक बार फिर अपने ससुराल और मायके फोन मिलाया, पता चला कि ट्रेन की टिकट बुक नहीं हुई, अगली सुबह तत्काल सेवा से बुक करके पहली ट्रेन से निकल लेंगे। गांव से फ्लाइट से चलने की तो सोच भी नहीं सकते। ढांढस बंधाने के अलावा वो सब फोन पर औऱ क्या कहते, थोड़ी देर बाद महिला ने फोन रख दिया। रोते-रोते महिला अपने पति की लाश के पास ही सो गई.. सोई या फिर बेहोश गई, ये तो उसे भी नहीं पता। सुबह उठते ही फिर उसने अपने पति की लाश देखी और कुछ देर तक वो फूट-फूट कर रोई।
सोसायटी में एंबुलेंस आने की बात सोसायटी के प्रेसिडेंट साहब को 24 घंटे बाद मिली। तब तक लाश से बदबू आने लगी थी। चार लोगों के साथ जब उन्होनें डोरबेल बजाई, तो एक दिन से लाश के साथ बेबस और अकेली बैठी महिला को लगा, जैसे उसके कान बज रहे हों। क्योंकि ऐसा उसे पहले भी कई बार लग चुका था। 3-4 बार बेल बजने पर वो गेट पर पहुंची और प्रेसिडेंट को पहचान कर उसने आपबीती बताई। घरवालों को आने में अब भी 20 घंटे और लग जाते, इसीलिए पांचों लोगों ने महिला को अंतिम संस्कार के लिए कहा, और लाश का दाह संस्कार कर आए।
कहानी को पढ़कर जैसा आपके मन में समाज और तथा-कथित दोस्तों के लिए भाव आ रहा है, शायद उससे कही ज्यादा घृणा उस महिला के मन में घर कर गई होगी। जो शायद अब उसकी मौत के साथ ही खत्म हो। पर इस वाकये के बाद सवाल जो सबके सामने है, वो ये कि क्या आपने अपने घर में उन चार कंधों की लिस्ट लगाई है, जिन्हें ऐसे वक्त में फोन किया जाए ?
क्योंकि आजकल की दोस्ती रुमाल की तरह हो गई है। रुमाल की खासियत ये होती है कि उसे आप अपनी जरूरत के वक्त इस्तेमाल कर या जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल करने के बाद दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं। जिंदगी में दोस्त कुछ इसी तरह होते हैं। जैसे रुमाल को खरीदा ही केवल अपने शरीर की गंदगी पोंछने के लिए जाता है, ठीक वैसे ही दोस्त नाम के इस रिश्ते को भी जरूरत के हिसाब से निभाने के लिए ही बानाया जाता है।
अंग्रेजी में तो साफ कहा गया है कि A Friend in need is a friend indeed.
सोसाइटी को ही सबसे सेफ और सिक्योर माना जाता है, ज्यादातर मेट्रो सिटीज में, लगभग यही सोच सभी की है। मैं भी एक मोहल्ले में रहता हूं। जहां एक वक्त तक सभी एक दूसरे का हाल आसानी से पूछ सकते थे। क्योंकि मकान एक मंजिला ही थे, पर जैसे-जैसे मकानों की मंजिलें बढ़ती गईं, दिलों के फासले बढ़ती सीढ़ियों के साथ बढ़ते चले गए। शायद हम में से कुछ लोग इसे मानने से इनकार कर दें, तो उन लोगों को मैं बधाई दूंगा, कि यार सच में आप जिंदा हो।
खैर, सोसायटी में रहने के अपने फायदे हैं, सिक्योरिटी और अगल-बगल के लोगों के अनचाहे हस्तक्षेप से छुटकारा। जी हां, अक्सर यही सुने हैं मैंने। पर जब ये कहानी सुनी, तो ये सारे फायदे एक बुलबुले की तरफ फूट गए।
एक सोसायटी में एक व्यक्ति की मौत हो गई। अचानक मौत, दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई। घर में केवल बीवी थी। पति को होश में न देखकर उसने जल्दी घर पर फोन मिलाया। घर लगभग 1000 किमी दूर था। वहां से एंबुलेंस को फोन करने की हिदायत के साथ सहारा दिया गया कि हम बस निकलते हैं। महिला ने एंबुलेंस को फोन करने के अलावा, पति के फोन में से आखिरी डायल्ड लोगों को भी फोन मिलाया। पति के ऑफिस के दोस्त थे, लगभग चार लोगों को फोन मिलाकर जब वो हटी, तो उसके सामने केवल अंधेरा था। क्योंकि सभी के पास कोई न कोई जरूरी काम था जिसे निबटा कर वो बस जल्द ही पहुंचने की बात कर रहे थे। महिला ने लगभग एक घंटा एंबुलेंस का इंतजार किया और एंबुलेंस के साथ पहुंचे डॉक्टरों ने उसके पति को मरा घोषित कर दिया।
महिला के ऊपर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। महिला के पास एंबुलेंस को चुकाने भर के पैसे ही घर पर थे। एंबुलेंस के जाने के बाद रोते-रोते कब वो खुद भी बेहोश हो गई, ये उसे चार घंटे बाद होश आने पर पता चला। अब रात हो चुकी थी। घुप्प अंधेरे के बीच, वो और उसके पति की लाश पड़ी थी। वो पति, जो कुछ देर पहले तक उससे मजाक करने के बाद अपना काम करने के लिए बैठा था। वो, जिसके अलावा वो इस सोसायटी में किसी को जानती ही नहीं थी। अचानक उसे अपने एकदम अकेले होने का एहसास हो गया। मन में सवाल आया कि अब क्या किया जाए ?
महिला ने एक बार फिर अपने ससुराल और मायके फोन मिलाया, पता चला कि ट्रेन की टिकट बुक नहीं हुई, अगली सुबह तत्काल सेवा से बुक करके पहली ट्रेन से निकल लेंगे। गांव से फ्लाइट से चलने की तो सोच भी नहीं सकते। ढांढस बंधाने के अलावा वो सब फोन पर औऱ क्या कहते, थोड़ी देर बाद महिला ने फोन रख दिया। रोते-रोते महिला अपने पति की लाश के पास ही सो गई.. सोई या फिर बेहोश गई, ये तो उसे भी नहीं पता। सुबह उठते ही फिर उसने अपने पति की लाश देखी और कुछ देर तक वो फूट-फूट कर रोई।
सोसायटी में एंबुलेंस आने की बात सोसायटी के प्रेसिडेंट साहब को 24 घंटे बाद मिली। तब तक लाश से बदबू आने लगी थी। चार लोगों के साथ जब उन्होनें डोरबेल बजाई, तो एक दिन से लाश के साथ बेबस और अकेली बैठी महिला को लगा, जैसे उसके कान बज रहे हों। क्योंकि ऐसा उसे पहले भी कई बार लग चुका था। 3-4 बार बेल बजने पर वो गेट पर पहुंची और प्रेसिडेंट को पहचान कर उसने आपबीती बताई। घरवालों को आने में अब भी 20 घंटे और लग जाते, इसीलिए पांचों लोगों ने महिला को अंतिम संस्कार के लिए कहा, और लाश का दाह संस्कार कर आए।
कहानी को पढ़कर जैसा आपके मन में समाज और तथा-कथित दोस्तों के लिए भाव आ रहा है, शायद उससे कही ज्यादा घृणा उस महिला के मन में घर कर गई होगी। जो शायद अब उसकी मौत के साथ ही खत्म हो। पर इस वाकये के बाद सवाल जो सबके सामने है, वो ये कि क्या आपने अपने घर में उन चार कंधों की लिस्ट लगाई है, जिन्हें ऐसे वक्त में फोन किया जाए ?
क्योंकि आजकल की दोस्ती रुमाल की तरह हो गई है। रुमाल की खासियत ये होती है कि उसे आप अपनी जरूरत के वक्त इस्तेमाल कर या जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल करने के बाद दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं। जिंदगी में दोस्त कुछ इसी तरह होते हैं। जैसे रुमाल को खरीदा ही केवल अपने शरीर की गंदगी पोंछने के लिए जाता है, ठीक वैसे ही दोस्त नाम के इस रिश्ते को भी जरूरत के हिसाब से निभाने के लिए ही बानाया जाता है।
अंग्रेजी में तो साफ कहा गया है कि A Friend in need is a friend indeed.

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