मेसेज भेजना बंद कर दो
गए दिनों की बातें हो गई हैं, जब मिल बैठते थे तीन यार। दारू की बात नहीं, दिल की बात करने को, दारूबाज तो आज भी मिल लेते हैं। लेकिन आजकल तो हर रिश्ते और हर त्योहार का बंटाधार इस इंटरनेट पर मौजूद फ्री मेसेज सेवा ने कर डाला है। जन्मदिन हो, त्योहार हो या फिर कोई बुरी खबर हो। संवेदनाएं, बधाई या फिर शुभकामनाएं सिर्फ एक मेसेज बन कर रह गई हैं। किसी दोस्त की टांग टूट गई हो तो उसके घर जाने की बजाए उसकी फेसबुक पर टूटी टांग वाली फोटो पर ऑऑऑ लिखकर सारा हालचाल उसी पर पूछ लिया जाता है। टूटी टांग वाला भी अब ऑनलाइन साइट और मेसेज सर्विस से मिलने वाली संवेदनाओं को ही रिअल मानकर काम चला लेता है। कई झगड़े तो केवल इसी बात पर हो जाते हैं कि मैंने तुम्हे मेसेज भेजा पर नीले टिक होने के बाद भी तुमने उसका जवाब 2 घंटे बाद क्यों दिया ? आखिर ऐसा क्या जरूरी काम था जो पढ़ने के बाद 20 सेकेंड का जवाब टाइप करने का भी समय नहीं मिला। वैसे ये मेसेज सर्विस इमोशंस को सप्लाई करने के लिए इमॉटिकॉन्स नाम की चीजों से भरी पड़ी है। ऑनलाइन साइट्स पर तो इनसे भी आगे शोले के गब्बर और बसंती से लेकर विदेशी मॉडलों की शक्...