गांव मतलब दादी
आखिरी कुछ दिनों में.. दादी हर रात मम्मी से यही पूछतीं.. पंकज आया क्या ? उनको मेंरा दाआआआआदी करके चिल्ला-चिल्लाकर बुलाना अच्छा लगता था। बचपन की कुछ यादें जो बिल्कुल ताज़ा हैं.. उनमें दादी भरी पड़ी हैं.. गांव के नाम पर बचपन का जो कुछ भी खट्टा-मीठा अनुभव है.. वो केवल दादी है.. दादी मेरी भी हर किसी दादी की तरह अपने पोते-पोतियों को बहुत प्यार करती थीं.. हमेशा गिनती करके बतातीं.. मेरे तो इतने बच्चे हैं.. गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने से पहले ही मम्मी-पापा से सवाल-जवाब शुरू हो जाते थे हमारे.. कब जाएंगे हम गांव.. मम्मी बताओ कब जाएंगे गांव.. दादी की बहुत याद हमें बस गर्मी की छुट्टियों के नाम से ही आने लग जाती थी.. गढ़वाल के पहाडों पर घुमावदार सड़कों औऱ खाइयों को झांक कर देखने से ही मुझे हर बार लगता था.. कि भगवान इस बार बचा ले.. बस को खाई में गिरने से.. अगली बार नहीं आऊंगा.. वो गंदा बस का उल्टी भरा सफर करने के बाद.. जब सड़क पर पैर पड़ते थे.. तब जाकर कहीं मेरी जान में जान आती थी.. घर से कुछ 3 पहाड़ चढ़ने उतरने पड़ते थे तब हमारे गांव पहुंचने के लिए.. बचपन में हर बार जब गांव पहुंचा.....