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दो भठूरे की सज़ा मौत.. करोडों की...मौज

चटाक....भिन्न...भिन्न...चटाक..चटाक...भिन्न... पच्च...मार डाला. ... साला... दिमाग भन्ना के रख दिया था। बस अब चैन की नींद आ जाएगी। पता नहीं ससुरों को मच्छरदानी के अन्दर का रास्ता कहां से मिल जाता है, कौनो सुरंग है का इहां? ये बोलकर मिश्रा जी दोबारा चादर तान कर खर्रांटों का बाज़ार गुलज़ार करने में लग गए। भुगते वो जिसकी भैंस बिहाई हो,मतलब साला, मेरी नींद का सत्यानाश। खैर सोने की पूरी कोशिश कर ही रहा था मैं, कि अचानक आवाज़ आई.. चोर...चोर...चोर... और मेरे मन में चोर पकडने से पहले आया, कि अब भैंस गई पानी में। क्यों... वो इसलिए.. के ये दिल्ली है मेरी जान.. चोर की आवाज़ आ गई मतलब... कट टु सीन  मैं भाग कर बालकनी में पहुंचा.. देखा एक छाया आगे आगे... और एक काला बादल पीछे पीछे।कुछ समझने की जुर्रत कर पाता.. कि इससे पहले.. धोनी ने डाइव लगाई.. औऱ लपक लिया उसका एक पैर. .धडाममममममम... आआआआआ.... पकडो...पकडो...मारो ... मारो... औऱ फिर सारी भीड ने बना लिया घेरा। मानो कसाब पकड लिया हो।  अब सुनिए मैं क्यों डर रहा था। चड्ढा जी, "देखा साले को कैसे डाइव मार के पकडा है। भाग कर जाता...

मैं औऱ मेरे वीआईपी

मेरे एक मित्र से आज मेरी बात हो रही थी। बातचीत के दौरान मैंने उससे कहा कि यार छुट्टी के दिन तो कम से कम कॉल कर लिया करो। तो उनका जवाब था, छुट्टी के दिन न मैं कहीं जाता हूं, न किसी से मिलता हूं औऱ न ही किसी से बात करता हूं। पढ कर आपको आश्चर्य जरूर हुआ होगा, सुनकर मुझे भी हुआ। ये मेरे बेहद करीबी मित्रों में से एक हैं। तो इस पर मैनें उनसे पूछा कि तो कभी ऑफिस से कॉल कर लिया कीजिए, तो कहते हैं, यार ऑफिस में ज्यादा फोन इस्तेमाल नहीं कर सकते। अलबत्ता उनके डेस्क पर भी फोन है औऱ ऑफिस से एक सेलफोन भी बाकायदा मिला है, जिसका बिल भी ऑफिस ही भरता है। बहुत मज़ाकिया किस्म के हैं ये साहब, सैड लोगों से बात भी नहीं करते। फिर पूछा के कभी मिल लो, तो कह दिया, कभी ऑफिस आ जाना या घर पर आओ। औऱ ये वो साहब हैं, जिन्हे मैं लगभग हर दिन फोन पर परेशान करता हूं। वो किसी ने कहा है, कि कोई इतना व्यस्त नहीं होता कि अपनी जरूरतें भूल जाए। कभी हर दिन साथ बैठकर चाय पिया करते थे, आज चाय पर होते हैं, तो फोन पिक तक नहीं करते। क्या आपके भी कोई ऐसे परम मित्र हैं, या मैं ही एक भगवान से लडने निकला हूं?