दादाजी !
आज तक लाश देखी तो कई बार है... पहला ब्लॉग भी एक लाश को देखकर विचलित होने के बाद लिखा था.. पर जब अपने पिता के पिता को बिना प्राणों के देखा, तो दिमाग बंद हो गया। मेरे दादाजी नहीं रहे! दादाजी के साथ मेरा रिश्ता कभी भी.. दादा-पोते वाला नहीं था.. जैसा आमतौर पर नाटकों..फिल्मों में देखता रहा हूं वैसा... कभी घोड़ा बनकर..कभी प्यार से पप्पी देकर... चॉकलेट देकर.. या फिर अपने बगल में सुलाते दादाजी की याद नहीं है मुझे.. मेरे दादाजी हमेशा गुस्सैल दिखे... बस डांटते ही रहते थे.. मम्मी हमेशा दादाजी के घर ले जाती..पर पहले धमका कर.."अगर शैतानी की तो अगली बार नहीं ले जाऊंगी। मेरे आंख दिखाने पर वो चीज़ तुरंत छोड़ देना।" मैं तुरररररंत कहता था,"हां मम्मी" लेकिन होता वही था हर बार, दादाजी बिना आदत छोड़े चिल्ला देते थे, और मम्मी ज़बर्दस्ती डांट पिला कर सुला देती थीं। पर इधर जबसे दद्दू हमारे घर शिफ्ट हो गए थे, मैनें एक बार भी गुस्सा करते नहीं देखा। बस हमेशा कहते थे, कि मैं किसी को परेशान नहीं करना चाहता, इसलिए हमारे घर के टॉप फ्लोर पर रहते थे दादी-दादा, औऱ अपना सारा काम भी खुद ही ...