बाबा रामदेव की वजह से मेट्रो का कॉम्पिटीशन जीतते हैं सभी
फिलहाल तो मेट्रो के बढ़े हुए किराए खबर बने हुए हैं, लेकिन दिल्ली में जब पहली बार मेट्रोे शुरू हुई थी, तब मेट्रो में घूमने की बात ऐसे बताई जाती थी जैसे प्लेन में सफर करे आया हो कोई। तारीफ के इतने पुल बांधे जाते थे, जितने खुद मेट्रो ने नहीं बनाए होंगे। खैर अब मेट्रो रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है।सुबह-सुबह जैसे ही आप मेट्रो स्टेशन पहुंचेंगे, आपका स्वागत करेगी एक लंबी लाइन। फिर आपको अच्छे से चेक करेगा सुरक्षाकर्मी, जिसके हाथ में पकड़े हुए यंत्र की हर पींपीं..... के साथ आपको अपने ऊपर ही शक होने लगता है। साला, कहीं जेब में कुछ है तो नहीं। शायद ही कोई ऐसा हो, जो उसकी पीं की आवाज के खत्म होने के बाद, जाओ सुनने का इंतजार न करता हो। खैर, थोड़ा आगे बढ़ेंगे तो एस्कलेटर पर ठुंसे हुए लोग ही आपको आपके सफर की मुश्किलों का अहसास करा देंगे। एस्कलेटर की हर सीढ़ी पर 2 लोग, बिना किसी से सटे हुए, खुद को बगल वाली रेलिंग पकड़कर संभाले हुए दिखेंगे। अब ये तो एस्कलेटर की बाहर निकली हुई जीभ औऱ धीमी गति से ही पता चल जाता है, कि दिल्लीवासियों की एकता और अनेकता के आगे वो कैसे हर दिन अपनी जिंदगी तलवार की धार पर गुजार रही है।
फिर आप पीली रेखा से दूर खड़े होने की बजाए, उसे स्टार्टिंग लाइन मानकर उसपर अपनी-अपनी पोजिशन लेकर उसैन बोल्ट की तरह पोजिशन लिए खड़े लोग दिखेंगे। हर नजर एक बार मेट्रो के साइन बोर्ड और फिर अगली बार अपनी घड़ी को देखकर कैलकुलेट करती दिखाई देगी। जैसे सारे के सारे ही आइंस्टाइन हों और आज दोनों घड़ियों के बीच माक्रो सेकेंड्स की गलती निकालकर ही दम लेंगे।
इसके बाद आती है आवाज, पों... हां भई.. इतनी ही होती है.. मेट्रो के ड्राइवर, भारतीय रेल के ड्राइवरों से थोड़ा अलग होते हैं। ये उनकी तरह हॉर्न पर हाथ रखकर भूल नहीं जाते। खैर रेल की पटरियों पर लोग घूमते औऱ हगते भी ऐसे हैं जैसे मुगल गार्डन या घर का पखाना हो। शायद इसीलिए ये उन ड्राइवरों की मजबूरी भी होती होगी, कि दूर से ही एक लंबा सा हॉर्न दे दें, ताकि उसे अपना काम समेट कर, धो-पोंछ कर निकलने में आसानी हो। खैर छोड़िए, हमें इससे क्या ? होते हैं कुछ लोग जिन्हे खुली हवा में सांस लेना और कुछ देना पसंद होता है।
हां तो भई जैसे ही मेट्रो का ड्राइवर छोटा सा पों करता है.. सब लोग तैयार हो जाते हैं.. अब शुरू होती है सबसे सटीक कैलकुलेशन। सबका दिमाग बस एक कदम दाएं और बाएं करते हुए खुद को दरवाजे के सामने ही सेट करना चाहता है। और दरवाजा खुलते ही आपका स्वागत करता है एक सुनामी। जनसंख्या का सुनामी। इतनी जोर से लोग बाहर की ओऱ बहते हैं कि अगर आप बीच में खड़े हैं, तो भगवान ही आपको उस ट्रेन में जगह दिला सकते हैं और जो लोग हल्का सा साइड होकर इन सबको डॉज देने में कामयाब हो जाते हैं, उन्हे मिलता है स्वर्णिम अवसर। जी हां, वो स्वर्णिम अवसर, जिसके कारण आप ब्रेन हैमरेज या हार्ट अटैक से बच सकते हैं।
क्योंकि इस अवसर की वजह से ही आप ऑफिस समय पर पहुंचकर अपने बॉस की गाली खाने और दिन भर दिमाग खराब होने से बच सकते हैंं। जो आगे चलकर आपने दिमाग की नस फाड़ या फिर दिल की धड़कन रोक सकता है। बस जैसे ही आपका पैर मेट्रो के अंदर पड़ता है, आपको अपनी जीत का अहसास हो जाता है।
आपको साफ दिखाई देता है आपका दिनभर का फ्यूचर। एक पैर रखने की जगह और बाकी बाबा रामदेव के सिखाए हुए योगासन से आप खुद को बैलेंस करते हुए, जिस तरफ से बगलवाले के पसीने की बदबू आए, तो उस छिद्र से सांस ना लेते हुए अनुलोम-विलोम के प्राणायाम की प्रैक्टिस का फायदा उठाते हुए, और अपने प्राणों को बदबू के चलते यम के पास पहुंचने से रोकते हुए, सफर के भवसागर को पार कर, ऑफिस के मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।
अब हर दिन की मेट्रो की कहानियों के लिए पढ़ते रहिए 'Delhi Metro' में मेेरे हर दिन के अनुभव
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