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रक्तदान... निकाल ली जान !

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वैसे तो 7 बार रक्तदान कर चुका हूं.. और ये आठवीं बार था, लेकिन इस बार का किस्सा सबसे अमेजिंग है। ऑफिस पहुंचकर अपने प्रोग्राम में पिला हुआ था कि इतने में मेरे एक भाई का फोन आया। पहले तो नाम देखकर असमंजस हुआ, क्योंकि भाईसाहब साथ में काम करते हुए भी इतने बिजी हो गए हैं, कि आजकल तो दर्शन ही दुर्लभ हैं। उसपर उनका समय निकाल कर मुझे फोन करना.. ओहो.. ये तो कयामत हो गई। खैर फोन उठाकर नमस्ते करते ही ऑर्डर मिला कि एक दोस्त की बीवी की तबीयत बिगड़ गई है औऱ उन्हे खून की जरूरत है। तो अब बीच का मामला कट करके हम निकल लिए खून देने के मिशन पर। किसी तरह पूछते-पाछते मैं पहुंचा स्टीफन अस्पताल और फिर पहुंच गया महिला पोस्ट ऑपरेटिव वाले कमरे में, वहां पुहंच कर मरीज का नाम बताया तो वो वहीं मिल गईं। काफी कमजोर लग रही थीं वो औऱ दर्द से लगातार कराह रहीं थीं। नमस्कार के जवाब में मैनें भी नमस्कार किया और परिचय का आदा-प्रदान हुआ। उनकी कराह सुनकर बस मन में लगातार उनके लिए प्रार्थना चल रही थी। उनसे बात हुई तो मैने ढांढस बंधाते हुए कहा कि ‘आप जल्दी ठीक हो जाएंगी’, इसपर मां के ह्रदय से आवाज आई कि ‘भइया बस वो ठीक रहे...