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अंत में अनंत का आभास है श्मशान

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“ देखकर खुद को फिरे है इतराता             ख़ुदा तेरी मिट्टी में खुदी कितनी है ”                       निगमबोध घाट पर चिताओं को जलते देखकर कई तरह की बातें मन में आ गईं। जिसे न पसंद हो न पढ़े। पर , साझा करने का मन है। जितनी बार श्मशान से लौटता हूं , सब झूठा लगने लगता है , अपने से चालाक औऱ ज़िंदगी में मारकाट की प्रतियोगिता में पारंगत महान व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति बढ़ जाती है। क्या इनका यह फ़न चिता को चकमा देने में काम आएगा। अनंत सुख देने वाला यह जीवन , जिसमें हल्की सी ज्यादा गर्मी से पसीने औऱ गर्म चीज़ से कई दिनों तक जलन औऱ फिर जलने का दाग रह जाता है , विडंबना यह कि उस जीवन को मुक्ति का मार्ग उसी आग्नि से मिलता है , फिर आजीवन जिंदगी देने वाले पानी में डूबने को छोड़ दी जाती हैं बची अस्थियां। सब कुछ शांत है। शिव भी शांत बैठे हैं। आपाधापी के बीच अजीब सी शांति का अनुभव है श्मशान। कल किसी ने मुझसे औकात का प्रश्न किया , सच में सबकी औकात कुछ क्विंटल लकड़ी ही है। फिर भी बहुत कुछ चाहिए सभी...