सफरनामा.. रेलगाड़ी और शिरडीवाले बाबा के दर्शन
कारण कुछ भी हो, भोले के दरबार जाने का जैसे ही मौका मिलता है, मैं निकल लेता हूं। कुछ वैसा ही हुआ जब मेरे दोस्त ने बताया कि वो अपने परिवार और और दोस्त के साथ महाराष्ट्र की यात्रा पर निकलने वाला है। उसने बताया कि शिरड़ी धाम के अलावा वो लोग त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के लिए भी जाने वाले हैं। अपने आराध्य से मिलने को मेरा मन भी आतुर हो गया और मैं अपनी दोस्त के साथ जाकर टिकट काउंटर से वेटिंग रेल टिकट ले आय़ा। पीआरओ के पास टिकट कन्फर्म कराने का बंदोस्बत कराने भी पहुंच ही गया। अलबत्ता जाते हुए एक ही बर्थ पर दोनों को लेटकर जाना पड़ा और आते हुए का कन्फर्म हुआ भी तो वो किसी काम का रहा नहीं, क्योंकि लगभग आधी गोवा एक्सप्रेस खाली थी। ऐसा लगा गोवा से आने वाले यात्री फिलहाल कुछ दिन के लिए नहीं लौटने वाले।
खैर ट्रेन दोपहर की थी इसीलिए अपन ऑफिस से ही अपना बोरिया-बिस्तरा लेकर निजामुद्दीन स्टेशन पहुंच गए। ट्रेन में बैठने से पहले ही रजनीगंधा की दुकान से कई रजनीगंधा लाने का ऑर्डर मिला, सो लेकर पहुंच गया ट्रेन के अंदर। सफर 21 घंटों का था बहरहाल पूरा बंदोबस्त किया गया था। शाम तक मस्ती की और फिर चल दिए तीनों दोस्त दो बर्थ पर एडजस्ट होने के लिए दूसरे डिब्बे में। S7 में पहुंचकर पता चला कि ट्रेन में एक सवा सौ से ज्यादा लोगों का ग्रुप भी शिर्डी, शनि शिंगणापुर और त्रयंबगेश्वर महादेव के दर्शनों के लिए जा रहा था। एक ही परिवार के लोग आमने सामने की सीट पर थे। हर मां एक जैसी होती है, सो सबसे नीचे वाली बर्थ पर लेटी हुई हंसमुख आंटी अपनी बेटी को लगातार एक के बाद एक चेपे पड़ी थीं। बहरहाल उदार आन्टी ने हमें थोड़ी देर की मोहलत के लिए अपनी एक बर्थ दे दी। हालांकि आधी रात को उनके ग्रुप में से किसी के आ जाने के कारण अलग बर्थ का लुत्फ खत्म हुआ और फिर प्रकाश के साथ एक ही बर्थ में सर्दी के थपेड़े खाने पड़े। सुबह उठते ही प्रकाश ने उम्मीद के मुताबिक मेरे आसुरी खर्राटों का जिक्र उठते ही किया।
गुनगुन दसवीं में थी और बाकी बच्चियों से थोड़ी ज्यादा शरराती भी। उसका भाई जो ग्रैजुएशन कर रहा था वो भी साथ ही था औऱ साथ थी इनकी मामी। तो इस परिवार के साथ बकर-बकर और मामी और बच्चों को लताड़ती मां के साथ ठहाकों में कब सुबह से दोपहर हुई और मडगांव स्टेशन आ गया, पता ही नहीं चला। रेल अपने आप में एक छोटा सा कस्बा होती है। हर तरह के लोग, तरह-तरह की आवाजें और खिड़की से गुजरते खूबसूरत नजारे आपको इतना उलझाए रहते हैं कि आप कभी बोर ही नहीं हो सकते। और हां सबसे बड़ी बात इसमें कभी भी अपनी 'शंकाओं' का समाधान करने का इंतजाम होता है, जिसके चलते बस की बजाय मैं रेल का सफर ही प्रेफर करता हूं। और इस दौरान मैं लगातार एक के बाद एक फोटो पेले रहता हूं और साथ में अपने फेसबुकियागंज के दोस्तों को भी सफर का आनंद बांटता रहता हूं।
खैर, हमने वहां से टैक्सी की और फिर पहुंच गए शिरडी के साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट में, इन सभी के रूम वगैरह काफी पहले से बुक थे, तो मेरे लिए बस एक एक्स्ट्रा पलंग लगवाना था। सारी एडजस्टमेंट और नहाने धोने के बाद हम लोग चल दिए पेट की आग बुझाने और बाबा के दर्शन करने। यहां मैं आप सभी को आगाह कर दूं, कि खाने के रेस्टोरेंट ने एक बार फिर पुरानी कहावत चरितार्थ कर मेरा अपने बुजुर्गों पर विश्वास औऱ बढा़ दिया। जहां जाओ वहीं का खाओ, मतलब भोजन हमेशा लोकल डिश का करो। पर नहीं हम सबने अपनी मनमानी करते हुए महाराष्ट्र के एक पंजाबी ढाबे में एंट्री ले ली। ऑर्डर वही दाल, पनीर, छोले-भटूरे और रोटी-चावल। वहां के खाने की जितनी तारीफ की जाए कम है, खाने में हर तरह का मसाला ठुंसा पड़ा था, बस एक ही चीज नहीं थी और वो है स्वाद... खाने की ऐसी की तैसी कराने के बाद अपन निकले साईं बाबा से इसकी शिकायत करने।
ट्रस्ट से नजदीक ही है सांई बाबा का मंदिर। तो एक शेयरिंग ऑटो 10 रुपए प्रति व्यक्ति पर तया हुआ और अपन पहुंच गए बाबा के दरवाजे पर। उतरते ही हमें वहां खड़े एक शख्स ने हाईजैक कर लिया। अंदर आराम से दर्शन फ्री में कराने का गाजर उसने हमारे आगे लटकाया और सीधा ले गया अपनी प्रसाद की दुकान पर। वहां पहुंचते ही उसने सबसे पहले प्रेम पूर्वक हमारी चप्पलें धरीं। एक टोकन हमारे मुंह पर मारा और फिर विधिवत हमारे अंदर के भक्त को पवित्र करने के लिए कुछ फूलों से भरी बोतल में भरे पानी से हमारे हाथ धुलवाए। हाथ मुंह धोने के तुरंत बाद उसने वही किया जिसका मुझे यकीन था। उसने सबसे पहली लाइन में ये साफ कर दिया कि आप सबसे सस्ता या सबसे महंगा प्रसाद खरीदें इससे कोई मतलब नहीं है। और वो केवल आपको ज्ञान दे रहा है.. कि बाबा को क्या-क्या चढ़ाया जाता है। यानी सीधे शब्दों में साफ-सुथरी मार्केटिंग कर रहा था। हमारे मुंह के आगे कई ऑपशन रखने के बाद उसने हमसे पूछा और हम सब जो परिवारों के साथ गए थे। अपनी बिना-बात की इज्जत को लुटने से बचाने के लिए लगे एक के बाद एक सस्ती महंगी चीजें चुनने। तो साहब बाबा पर चढ़ाने वाली चादर को मिलाकर हमारा हिसाब कुछ 900 के पास पहुंच गया। हमने रकम चुकता की और उसने एक लड़के को आवाज लगाकर ऑर्डर देते हुए हमें सबसे कम भीड़ वाले गुप्त रास्ते से अंदर पहुंचाने का आदेश दे दिया।
धार्मिक स्थलों पर लगने वाली भीड़ के चलते, अब मंदिरों में पेड वीआईपी एंट्री का चलन बढ़ गया है। ऑनलाइन दर्शन के भी ऑप्शन अब मौजूद हैं। खैर हमें फ्री में वीआईपी एंट्री का लालच था, सो चल दिए उसके पीछे। 200 रुपए प्रति व्यक्ति में आप वीआईपी एंट्री पा सकते हैं। और इस हिसाब से हमने प्रसाद का खर्चा कर लगभग 700 रुपए बचा लिए थे। मेरी गणित कमजोर रही है शायद इसीलिए यहां भी मैं मात खा गया। पर इस बार मेरे साथ और भी लोग थे, तो शायद बेवकूफ बनने का इतना बुरा नहीं लगा। उसने हमें गेट नंबर 2 से अंदर जाने का इशारा किया और वहां से वापस लौटने लगा। मैंने उसे चिल्लाकर साथ चलने का दुकानदार का वादा याद दिलाया, तो उसने कहा कि अंदर जाइए यहां से भीड़ नहीं मिलेगी।
असल में उस दौरान वहां भीड़ बिल्कुल नहीं थी। नवंबर के महीने में दोपहर के 3 बजे बाबा के दरबार में लोग बिल्कुल ना के बराबर थी। खैर दर्शन अच्छे हुए और अपन ने वहां बाकी मंदिरों के भी दर्शन किए। बाबा के दरबार से प्रसान और भस्म ली, दोस्तों और परिवार के लिए कुछ भेंट और वापस निकल लिए गेस्ट हाउस की तरफ। अगली सुबह 6 बजकर तीस मिनट पर शनि शिंगणापुर और त्रयंबकेश्वर महादेव के दर्शनों के लिए टैक्सी बुक कर काम खत्म किया और रात के खाने का इंतजाम कर सोने की प्लानिंग करने लगे।
इस दिन इतना ही घूमे हम। मन में सवाल होगा क्यों, अभी तो पूरा शाम बाकी थी ? तो मित्रों शाम तो बाकी थी, लेकिन ट्रेन में दो लोग एकसाथ ठंड का मुकाबला एक ही कंबल में करते आए थे। हिलते-हिलते सोने में बचपन में तो गहरी नींद आ जाती है, पर बाद में ट्रेन से उतरने के बाद भी शरीर के अंदर का हर सामान हिलता ही रहता है। मानों छुक-छुक करता ही जा रहा हो। और फिर इसकी छुक-छुक को आराम देने के लिए बिस्तर पर नींद का स्टेशन देना जरूरी होता है। सो वही किया अपन ने और निंद्रा देवी की गोद में शांति से टपक लिए। अगली सुबह मेरे आराध्य महादेव से मिलना भी तो था।
आगे का कल.. हर हर महादेव
खैर ट्रेन दोपहर की थी इसीलिए अपन ऑफिस से ही अपना बोरिया-बिस्तरा लेकर निजामुद्दीन स्टेशन पहुंच गए। ट्रेन में बैठने से पहले ही रजनीगंधा की दुकान से कई रजनीगंधा लाने का ऑर्डर मिला, सो लेकर पहुंच गया ट्रेन के अंदर। सफर 21 घंटों का था बहरहाल पूरा बंदोबस्त किया गया था। शाम तक मस्ती की और फिर चल दिए तीनों दोस्त दो बर्थ पर एडजस्ट होने के लिए दूसरे डिब्बे में। S7 में पहुंचकर पता चला कि ट्रेन में एक सवा सौ से ज्यादा लोगों का ग्रुप भी शिर्डी, शनि शिंगणापुर और त्रयंबगेश्वर महादेव के दर्शनों के लिए जा रहा था। एक ही परिवार के लोग आमने सामने की सीट पर थे। हर मां एक जैसी होती है, सो सबसे नीचे वाली बर्थ पर लेटी हुई हंसमुख आंटी अपनी बेटी को लगातार एक के बाद एक चेपे पड़ी थीं। बहरहाल उदार आन्टी ने हमें थोड़ी देर की मोहलत के लिए अपनी एक बर्थ दे दी। हालांकि आधी रात को उनके ग्रुप में से किसी के आ जाने के कारण अलग बर्थ का लुत्फ खत्म हुआ और फिर प्रकाश के साथ एक ही बर्थ में सर्दी के थपेड़े खाने पड़े। सुबह उठते ही प्रकाश ने उम्मीद के मुताबिक मेरे आसुरी खर्राटों का जिक्र उठते ही किया।
गुनगुन दसवीं में थी और बाकी बच्चियों से थोड़ी ज्यादा शरराती भी। उसका भाई जो ग्रैजुएशन कर रहा था वो भी साथ ही था औऱ साथ थी इनकी मामी। तो इस परिवार के साथ बकर-बकर और मामी और बच्चों को लताड़ती मां के साथ ठहाकों में कब सुबह से दोपहर हुई और मडगांव स्टेशन आ गया, पता ही नहीं चला। रेल अपने आप में एक छोटा सा कस्बा होती है। हर तरह के लोग, तरह-तरह की आवाजें और खिड़की से गुजरते खूबसूरत नजारे आपको इतना उलझाए रहते हैं कि आप कभी बोर ही नहीं हो सकते। और हां सबसे बड़ी बात इसमें कभी भी अपनी 'शंकाओं' का समाधान करने का इंतजाम होता है, जिसके चलते बस की बजाय मैं रेल का सफर ही प्रेफर करता हूं। और इस दौरान मैं लगातार एक के बाद एक फोटो पेले रहता हूं और साथ में अपने फेसबुकियागंज के दोस्तों को भी सफर का आनंद बांटता रहता हूं।
खैर, हमने वहां से टैक्सी की और फिर पहुंच गए शिरडी के साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट में, इन सभी के रूम वगैरह काफी पहले से बुक थे, तो मेरे लिए बस एक एक्स्ट्रा पलंग लगवाना था। सारी एडजस्टमेंट और नहाने धोने के बाद हम लोग चल दिए पेट की आग बुझाने और बाबा के दर्शन करने। यहां मैं आप सभी को आगाह कर दूं, कि खाने के रेस्टोरेंट ने एक बार फिर पुरानी कहावत चरितार्थ कर मेरा अपने बुजुर्गों पर विश्वास औऱ बढा़ दिया। जहां जाओ वहीं का खाओ, मतलब भोजन हमेशा लोकल डिश का करो। पर नहीं हम सबने अपनी मनमानी करते हुए महाराष्ट्र के एक पंजाबी ढाबे में एंट्री ले ली। ऑर्डर वही दाल, पनीर, छोले-भटूरे और रोटी-चावल। वहां के खाने की जितनी तारीफ की जाए कम है, खाने में हर तरह का मसाला ठुंसा पड़ा था, बस एक ही चीज नहीं थी और वो है स्वाद... खाने की ऐसी की तैसी कराने के बाद अपन निकले साईं बाबा से इसकी शिकायत करने।
ट्रस्ट से नजदीक ही है सांई बाबा का मंदिर। तो एक शेयरिंग ऑटो 10 रुपए प्रति व्यक्ति पर तया हुआ और अपन पहुंच गए बाबा के दरवाजे पर। उतरते ही हमें वहां खड़े एक शख्स ने हाईजैक कर लिया। अंदर आराम से दर्शन फ्री में कराने का गाजर उसने हमारे आगे लटकाया और सीधा ले गया अपनी प्रसाद की दुकान पर। वहां पहुंचते ही उसने सबसे पहले प्रेम पूर्वक हमारी चप्पलें धरीं। एक टोकन हमारे मुंह पर मारा और फिर विधिवत हमारे अंदर के भक्त को पवित्र करने के लिए कुछ फूलों से भरी बोतल में भरे पानी से हमारे हाथ धुलवाए। हाथ मुंह धोने के तुरंत बाद उसने वही किया जिसका मुझे यकीन था। उसने सबसे पहली लाइन में ये साफ कर दिया कि आप सबसे सस्ता या सबसे महंगा प्रसाद खरीदें इससे कोई मतलब नहीं है। और वो केवल आपको ज्ञान दे रहा है.. कि बाबा को क्या-क्या चढ़ाया जाता है। यानी सीधे शब्दों में साफ-सुथरी मार्केटिंग कर रहा था। हमारे मुंह के आगे कई ऑपशन रखने के बाद उसने हमसे पूछा और हम सब जो परिवारों के साथ गए थे। अपनी बिना-बात की इज्जत को लुटने से बचाने के लिए लगे एक के बाद एक सस्ती महंगी चीजें चुनने। तो साहब बाबा पर चढ़ाने वाली चादर को मिलाकर हमारा हिसाब कुछ 900 के पास पहुंच गया। हमने रकम चुकता की और उसने एक लड़के को आवाज लगाकर ऑर्डर देते हुए हमें सबसे कम भीड़ वाले गुप्त रास्ते से अंदर पहुंचाने का आदेश दे दिया।
धार्मिक स्थलों पर लगने वाली भीड़ के चलते, अब मंदिरों में पेड वीआईपी एंट्री का चलन बढ़ गया है। ऑनलाइन दर्शन के भी ऑप्शन अब मौजूद हैं। खैर हमें फ्री में वीआईपी एंट्री का लालच था, सो चल दिए उसके पीछे। 200 रुपए प्रति व्यक्ति में आप वीआईपी एंट्री पा सकते हैं। और इस हिसाब से हमने प्रसाद का खर्चा कर लगभग 700 रुपए बचा लिए थे। मेरी गणित कमजोर रही है शायद इसीलिए यहां भी मैं मात खा गया। पर इस बार मेरे साथ और भी लोग थे, तो शायद बेवकूफ बनने का इतना बुरा नहीं लगा। उसने हमें गेट नंबर 2 से अंदर जाने का इशारा किया और वहां से वापस लौटने लगा। मैंने उसे चिल्लाकर साथ चलने का दुकानदार का वादा याद दिलाया, तो उसने कहा कि अंदर जाइए यहां से भीड़ नहीं मिलेगी।
असल में उस दौरान वहां भीड़ बिल्कुल नहीं थी। नवंबर के महीने में दोपहर के 3 बजे बाबा के दरबार में लोग बिल्कुल ना के बराबर थी। खैर दर्शन अच्छे हुए और अपन ने वहां बाकी मंदिरों के भी दर्शन किए। बाबा के दरबार से प्रसान और भस्म ली, दोस्तों और परिवार के लिए कुछ भेंट और वापस निकल लिए गेस्ट हाउस की तरफ। अगली सुबह 6 बजकर तीस मिनट पर शनि शिंगणापुर और त्रयंबकेश्वर महादेव के दर्शनों के लिए टैक्सी बुक कर काम खत्म किया और रात के खाने का इंतजाम कर सोने की प्लानिंग करने लगे।
इस दिन इतना ही घूमे हम। मन में सवाल होगा क्यों, अभी तो पूरा शाम बाकी थी ? तो मित्रों शाम तो बाकी थी, लेकिन ट्रेन में दो लोग एकसाथ ठंड का मुकाबला एक ही कंबल में करते आए थे। हिलते-हिलते सोने में बचपन में तो गहरी नींद आ जाती है, पर बाद में ट्रेन से उतरने के बाद भी शरीर के अंदर का हर सामान हिलता ही रहता है। मानों छुक-छुक करता ही जा रहा हो। और फिर इसकी छुक-छुक को आराम देने के लिए बिस्तर पर नींद का स्टेशन देना जरूरी होता है। सो वही किया अपन ने और निंद्रा देवी की गोद में शांति से टपक लिए। अगली सुबह मेरे आराध्य महादेव से मिलना भी तो था।
आगे का कल.. हर हर महादेव

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