बच्चे भगवान का रूप होते हैं.. लेकिन अपने
सड़क पर नंग-धड़ंग बचपन की धुन में मलंग, मिट्टी और मैल से लिपटे तन से झांकती पसलियों के साथ, एक हाथ में सफेद कपड़ा लिए, दूसरे हाथ को फैला कर भीख मांगते बच्चों को देखकर दिमाग में कई विचार एक साथ मल्लयुद्ध करने लग जाते हैं। अगले दस सेकेंड बाद किसको कार में रखा बिस्किट दिया जाए या ना दिया जाए का फैसला जीता हुआ विचार होता है। लेकिन लाल बत्ती खत्म होने के बाद, हर बीतते दिन के साथ अर्जित की हुई ज्ञान की परत को हारे हुए सभी विचार मैल साबित करने पर तुल जाते हैं। ये तस्वीरें और वाकया आज शाम का है।
जैसे ही रामा कृष्णा आश्रम मार्ग मेट्रो स्टेशन
से मैं लौटने को हुआ, वहां खड़े स्ट्रीट फूड खाते मेरे कुछ दोस्तों ने मुझे अपने
साथ खाने का निमंत्रण दिया। खड़े होते ही मेरे पैर से ये चेक शर्ट वाला बच्चा आकर
लिपट गया और दस रुपए देने की जिद करने लगा। जिसे फिर मेरे दिमाग में जीते हुए एक
विचार ने डांट कर भगा दिया। बच्चे को भगाने के तुरंत बाद बाकी बचे विचारों ने अपनी
आदत के मुताबिक मुझे कोसना शुरू कर दिया। आज का ये ब्लॉग उन्ही विचारों की गालियों
का नतीजा है।
अब अपनी वैचारिक और माली गरीबी पर शर्म आने
लगी, तो सोचा अपनी बेइज्जती आपके साथ शेयर कर लूं। हर दिन हम यही कहते हैं कि बच्चे
भगवान का रूप होते हैं, लेकिन इस लाइन में भी हमने एक कंडीशन अप्लाई का स्टार छिपा
रखा है। जो इस लाइन के आगे जोड़ता है.... लेकिन अपने। मतलब बच्चे भगवान का रूप
होते हैं.. लेकिन अपने। क्योंकि सड़क पर खड़ा गरीब बच्चा जब भगवान, भूख और गरीबी
की दुहाई या फिर आपको दुआएं देते हुए आपसे कुछ रुपयों या फिर खाने की डिमांड करता
है, तो हजारों या लाखों प्रति महीना कमाने वाले हम दस रुपए को हजार रुपए की नजर से
देखने लगते हैं। मन में ये विचार भी आ जाते हैं कि ये बच्चा कहीं इस पैसे का
दुरुपयोग तो नहीं करने लगेगा।
मेरे साथ खड़ी मेरी मित्र की तरह कुछ भले लोग
इन गरीब बच्चों पर तरस खाकर इन्हें दुरुपयोग के डर से पैसे न थमा कर कुछ खरीद कर
तो दे देते हैं। पर फिर देने के तुरंत बाद इन्हे किसी और से पैसे मांगते देख अपने
किए हुए अच्छे काम को तोलने लगते हैं। क्या ये इसे खाएगा ? इसने अभी तक नहीं खाया, देखो इसे खाने की बजाय और मांगने की
पड़ी है, कितना लालची है ये बच्चा ? और न जाने क्या-क्या।
बच्चों के सामने खाना रखने के बाद जब मैंने
देखा कि दूसरा बच्चा पहले वाले के पास जाकर खाने को तैयार ही नहीं है और हम सभी से
रुपयों की जिद लगाए बैठा है। तब पहले तो अपने घर के बच्चों का हठ याद आया और फिर
भगवान को शुक्रिया किया कि मुझे मेरे माता-पिता की संतान बनाया और एक अच्छी जिंदगी
दी, लेकिन ठीक उसके बाद मेरे मन ने मुझे बच्चे की रुपयों की जिद को गलत नजर से
देखने के लिए कोसा। क्योंकि इतने छोटे बच्चे को सामने इतनी स्वादिष्ट खाने की चीज
देखने के बाद भी आखिर पैसों की क्यों पड़ी है? इस सवाल का जवाब इस चेक कलर की शर्ट पहने बच्चे के हाथ में
है।
ये फ्लूइड है, थिनर या कुछ और.. शायद जिसके
बारे में मुझे कुछ पता भी न हो। पर ये एक तरह का नशा है, इस बच्चे के हाथ से ये
सफेद कपड़ा छीन कर मैंने सूंघा तो थिनर जैसी ही गंध आई। हाथ से कपड़ा छीनने की जुर्रत
मैं इसीलिए कर पाया क्योंकि ये नशा करने वाला एक छोटा बच्चा था। कोई बड़ा होता तो
ब्लेड से वार या पत्थर का डर लगता और मैं ये कभी न करता। मैंने उस बच्चे को डराने
और आदत छोड़ने के लिहाज से बताया कि इससे उसे क्या हो सकता है, पर सच में क्या उसे
कुछ समझ में आया होगा, ये मुझे नहीं लगता।
शर्म हालांकि अपनी समझ पर आई, क्योंकि मैं उसके हाथ
से इस सफेद कपड़े को छीनकर जब कूड़े में फेंकने के लिए जाने लगा। तो दूसरा बिना
शर्ट का बच्चा जो चुपचाप टिक्की खा रहा था चिल्लाकर बोला, ये मेरे कपड़े हैं।
हैरान मैंने मुड़कर उसे देखा औऱ फिर वही बात दोहराते अपने दोस्तों को सुना। फिर उस
सफेद कपड़े को खोला तो पाया कि वो एक बनियान है। तस्वीर में दूसरे बच्चे की एक-एक पसली गिनी
जा सकती है। गुस्से में और झल्लाते हुए मैंने वो बनियान उसकी तरफ फेंकी और कहा कि
इसे पहनों और आज के बाद ये मत सूंघना वरना कुछ महीनों में मर जाओगे। मेरी ये बात खत्म होने से पहले ही दोनों वहां से उठे और हंसते हुए एक दूसरे के कंधे में हाथ रखकर, टिक्की को हाथ में पकड़कर चल दिए। सामने खड़ी दूसरी लड़की के सामने हाथ फैलाकर भीख मांगते हुए दोनों ने एक बार आंखों के आखिरी किनारों से मुझे देखा औऱ हल्की सी स्माइल दी।
मानों होठों की स्माइल मेरे लिए गाली हो और मायूस और मासूम आंखें अपने हर सवाल को बड़ा सवाल कहने वाले मुझ छोटे से पत्रकार से पूछ रही हों क्या हम अभी जिंदा हैं...
क्या फुटपाथ पर पड़ती वक्त की इस मार को जिंदगी कहते हैं.. अगर खुद हमारी जगह एक
दिन आ जाओ, तो तुम तो शायद उस दिन ही मर जाओगे।
अब लगता है कि ये हार है, मेरी.. आपकी.. इस पैसों की व्यवस्था की.. सो कॉल्ड दोगले समाज की.. और सरकार का तो कहना ही क्या... दिल्ली में तो आम आदमी की है.. और केंद्र में प्रधान सेवक.. जिनको शायद ही समाज के ताने बाने के आखिरी छोर में खड़े ये बच्चे दिखते हों ?
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें