सबसे ज्यादा एडजस्ट तो भगवान ही करता है


आज फुटपाथ पर भगवानों को आसरा दिए इस गरीब को देखा..  तो उसके मुंह पर सुकून के साथ....
इतने सारे बेघर-अपंग पड़े भगवानों के साथ खुद पर दया आ गई..

मन चंगा तो कटौती में गंगा.. अब गंगा भी मैली हो गई है.. औऱ साथ में मन भी.. तो फिर आस्था कैसे बचे.. वो भी हो गई..

कलियुग केवल नाम अधारा.. अब इसको कहने वाले ने तो कह दिया.. पर जैसे सबका अपना-अपना सच होता है. वैसे ही समझ भी.. औऱ समझ लगभग सभी की मतलबी होती है.. इसलिए आस्था को मन से जोड़ा गया.. लेकिन ज्यादातर लोग भगवान के साथ भी तीन-पांच करने से बाज नहीं आते..

सब्जी वाले भइय़ा.. 10 की क्यों 8 की दे दो ना.. ऐसे ही महाशिवरात्रि है.. मेरा व्रत है.. बस इतने में तो हो
जाना चाहिए भगवान को प्रसन्न.. औऱ क्या.. अब जान भी ले लेंगे.. मतलब ऑफिस के साथ-साथ क्या-क्या कर लें.. जो फीजेबल नहीं है.. उसे कैसे कर लें.. जी हां.. आज ही सुना मैंने.. ऐसा नहीं है कि मैंने नहीं किया ऐसा कभी.. लेकिन सुनते ही मन ने कहा कि सच ही तो है..

महाशिवरात्रि को शिवालयों में भीड़.. शिव पर चढ़ते जल.. बेल पत्र और उन्हें प्रसन्न करने की सभी सामग्री के साथ.. उनका वंदन करते हुए कई बार देखी है मैंने.. खुद भी शिव भक्त हूं.. पर कलियुग के इस दौर में सबसे ज्यादा अगर ... किसी ने एडजस्ट किया है तो वो हैं भगवान..

जिसे मानना होता है मानता है.. नहीं मानना होता नहीं मानता... जो मानता है.. वो चाहे जिसे मान ले..
भगवान, अल्लाह, गुरूग्रंथ साहैब या यीशू... और इससे भी आगे.. भगवानों में तो कई भगवान हैं.. जिन्हें चाहे मान लो औऱ मना लो.. मनाने के जतन भी अपने मन से.. मन करे तो व्रत.. नहीं करे तो सॉरी.. अब भगवान आकर डांटने तो लगेंगे नहीं..

शिवलिंग पर दूध वेस्ट करने की तो कई पोस्ट फेसबुक पर भी देखी होंगी.. वेस्टेज के खिलाफ तो मैं भी हूं.. पर यहां कोई तर्क किसी तरीके, विधि या फिर नियम-कानून पर नहीं दे रहा.. बस अपनी लाचारी से भगवान की लाचारी को तोलने की कोशिश कर रहा हूं..

बेचारे.. सुबह-सवेरे बैठ गए होंगे भोलेनाथ.. कईयों ने नहलाया होगा.. कई ने पुकारा होगा.. जिसने सिर्फ पुकारा होगा.. या फिर जिसने नहीं भी पुकारा होगा.. सबको बराबर ही देखने की सहनशक्ति है उनमें.. न्याय करने पर आएं तो हमारे तुम्हाने बॉस की तरह..गुडमॉर्निंग ढंग से नहीं करने पर भी स्क्रिप्ट पर लाल स्याही बिखे दें.. पर न.. वो नहीं करते ऐसा.. बैठे हैं.. देख रहे हैं..

फिर लगता है,.. कि हम सभी लालची होने के साथ इतने स्वार्थी हैं कि भगवान को भी नहीं बख्शते.. लात पड़ती है.. तो भगवान को गिनाने लगते हैं अपने किए हुए पुण्य.. कितनी बार जपा तेरा नाम.. और सुख आते ही.. एक आंख बंद करके.. माफी मांगकर.. व्रत न रखने की.. पूजा न करने की.. व्रत में कुछ खा लेने की.. हर चीज में ऑनलाइन शॉपिंग वाली वेबसाइट के कूपन की तरह.. ऑफर कूपन का नंबर चिपका कर.. मांग लेते हैं.. छूट..

पर जब फल लेने की बारी आती है.. तो मेरे ख्याल से शायद ही कोई कम गाली देता होगा ऊपरवाले को..
सैलेरी में कम बढोत्तरी होने पर.. तबीयत खराब होने.. ऐक्सिडेट होने.. चोरी हो जाने.. पर्स खो जाने..
मोबाइल टूट जाने.. किसी अपने के चले जाने.. किसी के दूर होने पर..

भगवान से घर मांगेंगे बड़ा.. घर में मंदिर.. सबसे छोटा हो.. जगह ज्यादा न घेरे..
कार सबसे महंगी.. कार के डैशबोर्ड में भगवान की फोटो नहीं लगाते.. वास्तु के हिसाब से..
सैलेरी बढ़े 100 फीसदी... गरीब को दान के नाम पर.. चिल्लर ढूंढ़ना जरा..

इसीलिए लगता है.. हम तो कुछ एडजस्ट नहीं कर रहे.. सबको बनाने वाला तो हर दिन एडजस्ट ही करता रहता है..
मंदिर में भगवा रंग से.. तो मस्जिद में हरे से.. गुरुद्वारे में और चर्च में भी..

अब इसका भी तोड़ दे देना तर्क शास्त्रियों.. कमेंट में.. भगवान तो कण-कण में हैं.. क्यों हैं न ?

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