दादाजी !


आज तक लाश देखी तो कई बार है... पहला ब्लॉग भी एक लाश को देखकर विचलित होने के बाद लिखा था.. पर जब अपने पिता के पिता को बिना प्राणों के देखा, तो दिमाग बंद हो गया।

मेरे दादाजी नहीं रहे!

दादाजी के साथ मेरा रिश्ता कभी भी.. दादा-पोते वाला नहीं था.. जैसा आमतौर पर नाटकों..फिल्मों में देखता रहा हूं वैसा... कभी घोड़ा बनकर..कभी प्यार से पप्पी देकर... चॉकलेट देकर.. या फिर अपने बगल में सुलाते दादाजी की याद नहीं है मुझे..

मेरे दादाजी हमेशा गुस्सैल दिखे... बस डांटते ही रहते थे.. मम्मी हमेशा दादाजी के घर ले जाती..पर पहले धमका कर.."अगर शैतानी की तो अगली बार नहीं ले जाऊंगी। मेरे आंख दिखाने पर वो चीज़ तुरंत छोड़ देना।" मैं तुरररररंत कहता था,"हां मम्मी" लेकिन होता वही था हर बार, दादाजी बिना आदत छोड़े चिल्ला देते थे, और मम्मी ज़बर्दस्ती डांट पिला कर सुला देती थीं।

पर इधर जबसे दद्दू हमारे घर शिफ्ट हो गए थे, मैनें एक बार भी गुस्सा करते नहीं देखा। बस हमेशा कहते थे, कि मैं किसी को परेशान नहीं करना चाहता, इसलिए हमारे घर के टॉप फ्लोर पर रहते थे दादी-दादा, औऱ अपना सारा काम भी खुद ही करते। बडी खुशी से सबको बताते, कि प्राइवेट नौकरी में भी किसी को 90 साल तक तन्ख्वाह मिलती है, मेरा तो फंड भी कटता है, मेरे जाने के बाद दादी को भी मिलेगी पूरी तन्ख्वाह। दादी औऱ मैं बोलते थे कि बस हमेशा अपना ही राग आलापते हैं। फिर वो शुरू हो जाते, कि कैसे वो 13 साल की उम्र में ही दिल्ली आ गए थे, औऱ नौकरी करते थे, कभी बिना खाए पिए रहना पड़ता था। अपने बच्चों के लिए क्या-क्या करा।

तब लगता था, बिना बात रिपीट करते हैं, लेकिन आज लगता है कि जो करता है, वही बोल सकता है क्योंकि जिसने कभी किसी के लिए कुछ न किया हो, सिर्फ लिया ही हो, वो क्या बखान करेगा।

हर सर्दी दादाजी की पीठ दुखती थी और हर गर्मी उन्हे लूज़ मौसम लग जाते थे (दद्दू लूज़ मोशन को यही बोलते थे) लेकिन इससे कभी उनकि दिनचर्या या शरीर पर फर्क नहीं पड़ा। हर सर्दी मैं दादाजी को छत पर ले जा कर उनकी पीठ पर तेल मालिश कर देता था, औऱ फिर 2 धंटे धूप सेकने का कहकर आ जाता था। उसके बाद तो बस हर किसी आने-जाने वाले को 1 महीने तक अपनी खाल पकडकर दिखाते थे, "मेरे पंकज ने मुझे जवान कर दिया और खुश" बस उनसे मांग कर कह दो, दादाजी आपने दाल बनाई है, खुद गर्म करके खिलाते थे, बहुत बढिया कुक थे दद्दू। अपना काम हमेशा खुद ही करते थे। पेपर के दिनों में रात में हर घंटे उठकर मुझे देखने आते... औऱ पढता देख खुश हो जाते, ठीक 3 बजे पहली चाय ले आते। फिर हर घंटे चाय आती रहती। मुझे एक्सरसाइज़ करते देख मुस्काते रहते। तेज़ गाना बजाने पर मम्मी चिल्लातीं.. पर दादू.. हंसकर कहते.. तू तेज़ गाना सुनता है.. मुझे अच्छा लगता है।

कॉलेज के दिनों में.. बॉल्ड लुक (गंजा) होने का स्टाइल था। मम्मी से बहाने से कहा कि बाल झड रहे हैं, सिर मुंडवा लूं.. मम्मी ने खूब डांटा... तो दादाजी के पास गया..औऱ कहा दादू बाल साफ करवा लूं.. उन्होने कहा.. कि मां से कह दे..कि मुझे कोई परेशानी नहीं है। दादाजी को अग्नि देने के बाद चाचाजी ने सिर मुंडवाया... पोते नहीं देते दादा को बाल...

एक दिन कील ठोंक रहे थे दरवाजे पर, 89 के उनके हाथ उनकी 18 साल की विल पावर का साथ नहीं दे रहे थे। मैने कहा, लाओ मैं कर दूं, तो हथौड़ा थमा दिया। मेरे कील ठोंकते ही कहने लगे, "आज तूने मेरा सबसे बडा काम कर दिया"। मेरे पूछने पर कहा, "काम कितना भी छोटा या बड़ा हो, जो काम अटका हो वही बड़ा होता है।" कम पढे लिखे होने के बावजूद बेहद समझदार औऱ आत्मसम्मान से भरे थे दादू।

हमेशा कहते थे कि किसी से सेवा नहीं करवाना चाहता। 7 तारीख को लूज़ मोशन लग गए औऱ अस्पताल मे एडमिट कर दिया। हमेशा की तरह कुछ बोतल सेलाइन की अंदर गईं औऱ घर आ गए। डॉक्टर ने कहा ठीक हैं। रात को हमेशा की तरह खाना भी खुद खाया, पर हमेशा की तरह सुबह होते ही चहकने नहीं लगे।

सुबह होते ही पापा से कहने लगे कि तबियत खराब है औऱ पापा उन्हे लेकर डॉक्टर के पास चल दिए। जाते-जाते दादजी ने गाड़ी में ही अपनी आखिरी सांसे ली।

पापा का फोन आया, मम्मी रोने लगीं औऱ गुडिया ने तो चिल्ला-चिल्लाकर हद कर दी। मैं गुडिया को कुछ समझाता, इससे पहले पापा का फोन आ गया, कि नीचे आ जाओ।

अब तक मेरे दिमाग़ में कुछ चल ही नहीं रहा था। नीचे पहुंचते ही मैने देखा... कि मेरे दादाजी, जो हमेशा हंसते हुए देखते थे, उनकी आंखे बंद थी औऱ हमेशा की तरह मुंह खुला कर, गहरी नींद में सो रहे थे। जो मुझे जानते हैं, उन्हे पता होगा, कि मैं हमेशा कहता हूं, कि सोते हुए आदमी और लाश में कोई फ़र्क नहीं होता। नींद से रोज़ सुबह उठ जाना भगवान का वरदान है। मैंने गाडी का दरवाजा भी नहीं खोला। पापा उतरे और बोले कि मैं उठा कर ले जाता हूं। मेरी कमर दर्द की वजह से कहा होगा शायद।

मैने अपने दादाजी को, जिन्होने मुझे अपनी गोद में खिलाया होगा, उन्हे अपनी गोद में उठाया, तो महसूस हुआ कि उनका आधा शरीर अकड़ चुका था। गाडी की पिछली सीट से किसी तरह बाहर निकाल कर ऊपर ले जाने के लिए मुड़ा औऱ तेज़ कदमों से सीढियां चढने लगा। पहले फ्लोर पर आते ही दादाजी का सिर दीवार से टकरा गया, एक पल को मुझे लगा कि दादाजी के सिर की मालिश कर दूं, पर इतनी तेज़ लगने के बाद भी दद्दू ने डांटा नहीं। तो यकीन हो गया कि दादाजी अब नहीं रहे।

अब उनका गुस्सा.. उनकी वो हल्की सी मुस्कुराहट... उनका जन्मदिन... जब हम उनके लिए केक ले जाते थे... उनका खुश होकर कहना, "बेटा खूब तरक्की करो"..  सबकुछ याद आएगा।

टिप्पणियाँ

  1. Dis post made me cry...It would be demeaning you relationship with your Dadaji if I wrote anything..Hardly have I come across any piece as touching as this one. Your command over the language is very good..

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    1. @ Life's Horizon, thnkooo my friend and sorry for late reply.. I just saw this..Grandparents ke pyaar ko koi replace nahi kar saktaa...

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