मैं औऱ मेरे वीआईपी
मेरे एक मित्र से आज मेरी बात हो रही थी। बातचीत के दौरान मैंने उससे कहा कि यार छुट्टी के दिन तो कम से कम कॉल कर लिया करो। तो उनका जवाब था, छुट्टी के दिन न मैं कहीं जाता हूं, न किसी से मिलता हूं औऱ न ही किसी से बात करता हूं। पढ कर आपको आश्चर्य जरूर हुआ होगा, सुनकर मुझे भी हुआ।
ये मेरे बेहद करीबी मित्रों में से एक हैं। तो इस पर मैनें उनसे पूछा कि तो कभी ऑफिस से कॉल कर लिया कीजिए, तो कहते हैं, यार ऑफिस में ज्यादा फोन इस्तेमाल नहीं कर सकते। अलबत्ता उनके डेस्क पर भी फोन है औऱ ऑफिस से एक सेलफोन भी बाकायदा मिला है, जिसका बिल भी ऑफिस ही भरता है। बहुत मज़ाकिया किस्म के हैं ये साहब, सैड लोगों से बात भी नहीं करते। फिर पूछा के कभी मिल लो, तो कह दिया, कभी ऑफिस आ जाना या घर पर आओ।
औऱ ये वो साहब हैं, जिन्हे मैं लगभग हर दिन फोन पर परेशान करता हूं।
वो किसी ने कहा है, कि कोई इतना व्यस्त नहीं होता कि अपनी जरूरतें भूल जाए। कभी हर दिन साथ बैठकर चाय पिया करते थे, आज चाय पर होते हैं, तो फोन पिक तक नहीं करते।
क्या आपके भी कोई ऐसे परम मित्र हैं, या मैं ही एक भगवान से लडने निकला हूं?
ये मेरे बेहद करीबी मित्रों में से एक हैं। तो इस पर मैनें उनसे पूछा कि तो कभी ऑफिस से कॉल कर लिया कीजिए, तो कहते हैं, यार ऑफिस में ज्यादा फोन इस्तेमाल नहीं कर सकते। अलबत्ता उनके डेस्क पर भी फोन है औऱ ऑफिस से एक सेलफोन भी बाकायदा मिला है, जिसका बिल भी ऑफिस ही भरता है। बहुत मज़ाकिया किस्म के हैं ये साहब, सैड लोगों से बात भी नहीं करते। फिर पूछा के कभी मिल लो, तो कह दिया, कभी ऑफिस आ जाना या घर पर आओ।
औऱ ये वो साहब हैं, जिन्हे मैं लगभग हर दिन फोन पर परेशान करता हूं।
वो किसी ने कहा है, कि कोई इतना व्यस्त नहीं होता कि अपनी जरूरतें भूल जाए। कभी हर दिन साथ बैठकर चाय पिया करते थे, आज चाय पर होते हैं, तो फोन पिक तक नहीं करते।
क्या आपके भी कोई ऐसे परम मित्र हैं, या मैं ही एक भगवान से लडने निकला हूं?
acha lekh hai janab ...gud one :)
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