BBC है की मानता नहीं


BBC की निर्भया पर डॉक्यूमेंट्री देखी, वकीलों की बातें दुखी करने वाली हैं, दोषी की बातें, दिल दहला देने वाली हैं, पर सबसे बड़ी परेशानी बीबीसी की देश को गरीब प्रोजेक्ट करने वाली आदत से है, जो इसमें भी दिखती है, भाई बीबीसी वालों, हमारे देश में पुलिसबल हाईली इक्विपड हैं, घोड़े पर बैठे दो पुलिसवाले दिखाने का क्या मकसद है इस डॉक्यूमेंट्री में आपका ? 16 दिसबंर 2012 को जो हुआ वो घटिया था, हमारा देश आत्ममंथन कर रहा है इस पर, बहुत कुछ बदलना बाकी है, बहुत कुछ बदलेगा।


इस डॉक्यूमेंट्री से मानसिकता बदलने वाली बात इस हद तक सामने आ जाती है कि शायद इसे देखकर कुछ लोग अपनी सोच भी बदलें, 

वकील औऱ दोषी दोनों के मुताबिक, लड़की और लड़का रिश्तेदार होने के अलावा, किसी और रिश्ते में होते हुए, रात में बाहर निकल कैसे सकते हैं? 

मानसिकता बदलने का मतलब बहुत बातों से है, लेकिन बीबीसी को भी अपनी मानसिकता बदल लेनी चाहिए, हमारे देश में स्नेक चार्मर्स, बैलगाड़ी, घोड़ागाडी़ के अलावा और भी बहुत कुछ है, अपनी डॉक्यूमेंट्री में पुलिस हेडक्वॉर्टर, उसके सामने वाला भूमिगत पैदल पार पथ, ठीक सामने बहुमंज़िला डीडीए की इमारत, दिल्ली मेट्रो, एसी बसें भी दिखा देते।

गलती कुछ गंदी सोच वाले लोगों से हुई, उन्हे फांसी की सज़ा सुनाई गई है, बदलाव लाने की कोशिश में है हमारा देश, कृपया आप भी बदलें ।

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