बाहुबली में धर्म का खूबसूरत चित्रण

बाहुबली फिल्म का डंका चारों ओर कुछ इतना बज गया, कि मेरे भी दिमाग के सुप्त कलाकार कीटाणु, भूख से कुलबुला उठे. यहां पहले ये स्वीकार कर लूं कि मैंने फिल्म देखने से पहले उसके इफेक्ट्स की हॉलिवुड फिल्मों से तुलना सुन-सुनकर थोड़ा बायस्ड होकर सोचा था, कि बाद में देख लूंगा. फिल्म की शुरुआत चिर-परिचित साउथ वाली फिल्मों वाले अंदाज में हुई, जब एक औरत एक बच्चे को बचाते हुए महा जल प्रपात में कूद जाती है, लेकिन पूरी डूबकर भी नन्हे बालक को थामे उसका हाथ जल से ऊपर ही रहता है, औऱ उसे जल प्रपात के दूसरी ओर एक मां के हाथों में सौंपकर,  एक इशारा कर भगवत धाम की ओर निकल लेती है.

कुछ-कुछ श्री कृष्ण के देवकी से यशोदा की गोद तक पहुंचने, या सूर्यपुत्र कर्ण की कथा का बेहतरीन कल्प-फिल्मांतरण.

आधी फिल्म में हीरो यानी बाहुबली उस महा जल प्रपात के ऊपरी छोर में पहुंचने की कोशिश में लगा रहता है,
रॉक क्लाइम्बिंग, माउंटेन क्लाइम्बिंग भूल जाइए, क्योंकि यहां बाहूबली एक काई से भरे, निरंतर तेज पानी के गिरते हुए बहाव को काटकर, अपने पिता औऱ मां का प्रतिशोध लेने पहुंच जाता है.

लेकिन यहां भी फिल्मकार राजामौली की प्रतिभा आपको एक अतिश्योक्ति पर सहज ही विश्वास करने पर मजबूर कर देती है. तकनीक औऱ कला का एक अद्भुत संगम आपको अपने भंवर में खींचता ले जाता है, और खूबसूरती ये कि आप कहीं भी बचने की कोशिश तक नहीं करते.

धर्म औऱ पौराणिक कथाओं का एक हल्का ब्लेंड किसी भी कहानी या फिल्म को साधारण से बेहतरीन बना सकता है. बाहुबली इस बात का सटीक उदाहरण हो सकती है. इस फिल्म में धर्म के हर पहलू को राजामौली ने अद्भुत कौशल से दर्शाया है. हर बार ये फिल्म आपके विश्वास को झकझोरेगी और आप ना चाहते हुए भी उसे स्वीकार करते चले जाएंगे और यही आपको फिल्म को आगे और आगे देखने पर मजबूर कर देता है.

जवान बाहूबली की मां को हमेशा अपने बेटे के जल प्रपात को पार करने के चक्कर में मरने या पार करके खुद से दूर होने की चिंता सताती रहती है. उसे इससे रोकने की इच्छा लिए वो एक विशाल शिवलिंग की उपासना में लीन एक ऋषि के पास जाती है. इस सीन में धर्म, विश्वास औऱ अंध विश्वास को बेहतरीन तरीके से पेश किया गया है,

मां झरने से पानी ला-लाकर शिवलिंग पर डालकर थकी जा रही है,
बाहूबली अपनी मां को अंधविश्वास में पड़ने से रोकने की कोशिश करता है,
मां नहीं मानती तो बाहूबली क्रोधित होकर शिवलिंग को पास ही पड़े सब्बल से उखाड़ने लगता है,
इस दौरान बाहूबली की मां उसे अनर्थ की आशंका से रोकने का प्रयास करती है, वहां खड़े लोग शिव के क्रोध औऱ तबाही से बचने के लिए
ऋषि से बाहूबली को रोकने की प्रार्थना करने लगते हैं, लेकिन ऋषि का ये कहना 'कि जो भोले के मन में होगा वही होगा' उसके
भगवान पर विश्वास को दर्शाता है, इस बात को समझाता है कि भगवान नहीं चाहते तो ये सब होता ही नहीं, जो हो रहा है औऱ जो होगा
वो सब उसकी इच्छा से होगा.
सीन के अंत में बाहुबली शिवलिंग को जल प्रपात के नीचे एक जगह स्थापित कर अपनी मां से कहता है कि लो अब तुम्हारा शिव नहाता रहेगा
(रामायण में रावण भी शिवलिंग उठाकर लंका में स्थापित करने के लिए चल पड़ा था)

और अंत में फिल्मकार बड़ी ही खूबसूरती से शिव की असली आस्था से पूजा करने वाले बाहुबली की इच्छा को पूरा होता हुआ दिखाता है

आखिर में एक और बात,

रामायण की ही तरह, इसमें एक महिला को एक दुराचारी ने बंधक बनाकर ऱखा है, उसे छुड़ाने एक बाहुबली जाता है

जी हां, जैसे सीता बंधक थीं, रावण महादुराचारी था, वैसै ही, और जैसे हनुमान गए थे, वैसे बाहुबली जाता है,
जैसे हनुमान ने आग लगा दी थी, वैसे ही बाहूबली भी लगा देता है, हां बस पूंछ से नहीं लगाता.

फिल्म का दूसरी हिस्सा बाद में दिखाया जाएगा, लेकिन कमाल की कल्पना और धमाल फिल्मकारी की जितनी सराहना की जाए कम है.

इसे बॉलीवुड में एपिक फिल्मों की एक बार फिर शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है

हॉल पर देखने लायक है बाहुबली

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