बर्फ़ हुई संवेदना, ख़त्म हुई सब बात....


वर्चुअल वर्ल्ड में फ्रेंड लिस्ट की हदें पार कर दूसरा फेसबुक अकाउंट बनाने या फिर पेज बनाने को मजबूर हो चुके कई सोशल बटरफ्लाइज़, आखिर डिप्रेशन में आकर खुदकुशी क्यों करने लगे हैं ? कहीं इसकी वजह  हम ही तो नहीं ? 
ज्यों-ज्यों हम बुद्धिजीवी विकसित होते जा रहे हैं, ऐसा लगता है रोबॉटिक भी होते जा रहे हैं। दोस्त के साथ लगाए जाने वाले ठहाके अब :) ऐसे इमोटिकॉन बन चुके हैं, बुरी खबर पर फोन करके या मिलने जाने की जगह फेसबुक पर RIP लिखकर नेगेटिविटी से पल्ला झाड़ने या फिर संवेदना प्रकट करने का चलन है। मानों सबके अंदर से इमोशन नाम की चीज खत्म होती जा रही है। क्या ये हमारे इवॉल्यूशन का अगला लेवल है ?

ज़रा अपने आस-पास गौर से देखिए, कितने लोग हैं जो आपके लिए कभी भी कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। बशर्ते आप बॉस नहीं हों, क्योंकि अगर ऐसा होगा तो आपके पास मक्खन लगाने वालों की फौज होगी।

जब आप सच में इस सवाल का जवाब एकदम निष्पक्षता से ढूंढेंगे, तो पाएंगे कि आपके एक-दो दोस्तों को छोड़कर बाकी कोई नहीं। हालांकि आपका जवाब, घर पर आपका परिवार भी हो सकता है। किंतु थोड़ा और आगे चलकर सोचेंगे, तो शायद आप शून्य पर भी पहुंच सकते हैं। क्योंकि सच बात तो ये है कि अब हर कोई आपसे बात भी अपना फायदा-नुकसान सोचकर करता है।

हां, अगर आपकी पहुंच है, आपके पास पैसा है, आप दिखने में अच्छे हैं, आपका व्यक्तितव अच्छा है। इन सब में से कोई भी क्वॉलिटी आपके अंदर है, तो शायद आप ये कह सकते हैं कि आपके कई दोस्त हैं। पर सच मानिए इनमें से कोई भी आपसे इमोशनली कनेक्टिड हो, ये जरूरी नहीं।

अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा है क्यों?  तो शायद इसका जवाब हम सबके अंदर ही है। जवाब ये, कि हम हमेशा अपने फायदे के बारे में ही सोचते हैं। परेशान हो तो हंसमुख शख्स से बात करोगे, पैसे से परेशान हो तो किसी संपन्न व्यक्ति के पास बैठोगे, नए-नए जवान हो तो पार्टनर की तलाश में होगे। यानी सब काम केवल मतलब से करोगे।

जवाब में केवल ये सोचो, कि आपका बेमतलब का यार कौन है? वो जिसने कभी आपसे अपना मतलब साधा ही नहीं.. जो बस आपके साथ है.. और अगर मिल जाए तो उसे सहेज लो, क्योंकि ये एक विलुप्त होती दुर्लभ प्रजाति है, जिसे संरक्षित करना और बढ़ावा देना प्रकृति के लिए जरूरी है। वर्ना.. भोले की शरण में जाओ.. क्योंकि एक वो ही है.. जो है और हमेशा रहेगा।

टिप्पणियाँ

  1. Wow Pankaj...itne din baad kuch achha padhne ko mila..sahi nazariya hai

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    1. Thnx, for reading and appreciating it. If you have time read the other stories too and please share them.

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  2. Wow Pankaj...itne din baad kuch achha padhne ko mila..sahi nazariya hai

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  3. Bahut shaandaar likha hai ....... sach me samvednao ka to ambaar hai par facebook or watsappp par ..................utho or jago duniya bahut sundar hai digital se bhi sundar real hai... sach kaha

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  4. badia pankaj sir. Me bas itna kahunga ki me puri tarah se abhi vilupt nahi hua hu.

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  5. �� you're absolutely right. Everyone is busy in their own world. No one has true and real friends. And even no one have any idea that how beautiful the real life is :)

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    1. वैसे तो मैं ये नहीं जान पाया कि आप कौन हैं ? लेकिन हां, आपकी बात एकदम सही है, लोग देना ही नहीं चाहते। जो उनके लिए करता है उसे वो सामने वाले का फर्ज समझते हुए उसका मोल नहीं पहचानते। औऱ खुद किसी के लिए कुछ भी करने में देश काल परिस्थिति और फिर अपने मतलब का गुणा भाग करके अगर फायदा निकले तो ही करते हैं। क्या प्रकृति भी ऐसा ही करती है?

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    2. I am Gursharan Kaur & I commented even on Shivani Pant's post. And no, nature don't do anything like this.

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