हम हैं सुपर ह्यूमन्स


ये सुपर ह्यूमन्स का दौर है... आने वाले कुछ सालों बाद.. वो भी तब, अगर माया कैलेंडर की 2012 की भविष्यवाणी सच साबित न हुई...तो क्या होगा...

कल्पना कीजिए... आज से लगभग 40 साल बाद..या हो सकता है, उससे भी पहले.. चलो, ठीक-ठीक लगा लेते हैं... न आपकी, न मेरी... 30 साल बाद चलते हैं...यानि...

सन 2042... क्या होगा तब... शायद तब... हममे से जो लोग ज़िदा होंगे.. उनपर रिसर्च की जाएगी... क्यों.. अरे भाई.. एक बात बताइए... आज अगर आप.. इंटरनेट की दुनिया के भगवान... यानि बाबा गूगल बाबा पर..मिलावटी खाद्य लिख कर, एक खोज कर लें.. तो आप ये जानकर ही चकित रह जाएंगे कि इस खोज के परिणाम स्वरूप आपको 75,000 रिजल्टस मिलेंगे...  मिलावटी दूध पर 34,000 औऱ हर दीवाली और होली पर मिलने वाली वैधानिक चेतावनी... यानि मिलावटी मिठाई.. के नाम पर 31,500 वेब पेजिस आपको इस मिलावट के बारे में, इससे बचने, पहचानने और इससे होने वाली परेशानी का विवरण दे देंगे। थोडा औऱ कष्ट उठाने पर, आपको दवाइयों के नाम तक मिल जाएंगे।

तो सोचिए.. कि हम लोग जो आज की तारीख में.. मेट्रो सिटी में रहने का दम भरते हुए जी रहे हैं, क्या ये जानते हैं, कि ये हवा हमें दमे का मरीज़ बना कर ही छोडेगी।

जी हां, बॉम्बे में रहने वाले लोग तकरीबन 100 सिगरेट का धुंआ रोज अपने फेफडों से साफ करते हैं, ये मैं नहीं एक UN Report कहती है।

दिल्ली के पानी में सुपरबग या फिर कम औकात वाले छोटे मोटे कीडे मिलना भी आम बात है, जबकि पानी में अगर जरूरत से ज्यादा क्लोरीन डल जाए तो किडनी औऱ दिल की बीमारी, औऱ कम क्लोरीन और ज्यादा फ्लोराइड हो जाए, तो हड्डियों की बीमारी हो सकती है।

अब बात खाने की, तो ये तो आप हर 5-6 महीनों में न्यूज में देख ही लेते हैं, कि किस तरह से सब्जियां ताजी होती हैं, कलर लगा कर, फलों पर पॉलिश औऱ वैक्स का इस्तेमाल किया जाता है। औऱ कहीं आप यमुना किनारे उगी ताजी सब्जियां खाने के शौकीन हैं, तो आप फैक्ट्रियों से निकला जिंक, लेड वगैरह भी अपने लिवर को झिला रहे होंगे।

आपको याद होगा... कि हमारे देश में घी दूध की नदियां बहा करती थीं....बात दूध की... तो वो भी सफेद रंग की बदौलत कम मशहूर नहीं है... वो भी नहीं.. तो भैंसों और गायों को दूध बढाने के लिए लगने वाले इंजेक्शन के साइड इफेक्टस भी कम नहीं हैं। लेकिन दूध तो चाहिए ही.. क्योंकि देश का नैशनल ड्रिंक घोषित किया जाने वाला पेय चाय भी तो इससे ही बनता है।

कहने का मतलब डराना बिलकुल नहीं है। देखिए, हम इंसान प्रकृति का नायब नमूना है, (या फिर एक भयानक गलती, जिसे वो भुगत रही है) जो अपने आपको जरूरत के हिसाब से ढाल लेता है। ये शरीर भी कमाल का है। आज से 50 साल पहले स्पॉन्डेलाइटिस एक बीमारी थी, अब ये आम है, कमर का दर्द और हड्डियों की कमजोरी भी आम है, यकीन न हो तो कुकुरमुत्ते से उगते फिज़ियोथैरेपी क्लीनिक्स पर गौर फरमाइए।

तो भई हम लोग अगर कहीं 70 पार हो लिए, तो हमारे हर पार्ट का होगा चेकअप। हर इंसान हाथियों की तरह राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया जाएगा। पेंशन मिलेगी सरकारी और मर्दों के चमत्कारी स्पर्मस को बैंक कर लिया जाएगा। क्योंकि आगे आने वाली जेनरेशन को भी तो चाहिए होगा ये फर्टिलाइजर पचाने वाला लिवर, ये प्रदूषित हवा छानने वाला फेफडा और इन सबसे परे... दुनिया को और बदतर करने के तरीके ईजाद करने वाला.... ये भडकाऊ दिमाग।

टिप्पणियाँ

  1. bahut badhiya dost, sach mein tarakki to haar chiz mein ho rhi hai, bimariyon mein bhi aur insano ke khatam hone ki bhi, ager hum iss tarah tarakki karte rhehne to wo diin duur nahi jab jurasic park ki hi tarah hum insano per bhi film bnai jaegi aur btaya jaega ki pehle insan ese dikha kerte thi.

    Ruchi Rai

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