जो होता है...अच्छे के लिए होता है

Tuesday, February 22, 2011

कल रात जब मैं राम मनोहर लोहिया के कम्पाउंड में घूम रहा था। कोशिशों से घिरा,प्रार्थना में उलझा मेरा मन तडपने के साथ साथ मुझे कोस भी रहा था। एक और बार प्रकृति मुझे मेरे तुच्छ होने का एहसास करा रही थी। एक बार फिर मैं मौत को करीब से देख रहा था। एक करीबी के न होने का बुरा सपना मान कर, नींद खुलने का इंतजार करता, ये जानते हुए कि न मैं नींद में हूं और न ही ये कोई सपना ही है।  पहली बार किसी को वेंटिलेटर पर लेटे देखने पर कैसा लगता है, शायद ये भी सिर्फ मां के निश्छल प्यार की ही तरह महसूस किया जा सकता है। वो कोई नेता या कोई नाते-रिश्तेदार भी नहीं, पर पिता के समान प्यार करने वाले पिता के दोस्त को मौत के बिस्तर पर लेटा देखकर मेरी आंखे मेरा साथ छोड कर अपने आप न जाने क्यूं भर आईं। और लगा...

मौत ही अगर सत्य है, तो फिर हम ज़िंदा क्यूं हैं....एक ही है मंज़िल अगर, तो फिर हम जुदा क्यूं हैं... तकदीर अगर है इंसां के हाथ में, तो फिर खुदा क्यूं है.... चलना ही अगर वक्त है, तो आज यूं रुका क्यूं है....

टिप्पणियाँ

  1. sirf maut hi stya nahi zindagi bi utni hi satya hai,bhagwan sri krishna ne zindagi jine ke lie hi geeta kaha,manjil to ek hi hoti hai lekin alag nazrie ki wajah se hm juda rehte hai ye bat alag hai ki kuch log galat nazrien ki wajh se bhatkte reh jate hai,insaan ke hath me taqdir to hai lekin kahi wo belagaam hoke khud ko khuda samjne na lage,apni aukaat na bhul jae islie khuda hai...wakt to chalta hi rhta hai anvarat lekin hm jb arjun wali sthi me akar moh ke adhin ho jate hai to wakt ruka hua lagta hai.aise ye line aur ye blog ek pavitra emotion hai jo adami ko insaan bbanata hai.

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कान के कच्चे राजा की अनसुनी कहानी

गांव मतलब दादी

She loves me... She loves me not ( trying my hands on fiction)