बचाओ !
पिछली बार हुए केदारनाथ हादसे के बाद जनता, मीडिया और सरकार का ध्यान पहाड़ों की परेशानियों की तरफ गया है। ऐसा नहीं है
कि पहले से वहां विकास के काम नहीं हो रहे, लेकिन जो हो रहे हैं
वो बेहद नाकाफी औऱ कम क्वालिटी के हैं। प्रकृति पर मानव की मार का बदला कहा जाए या
फिर दैवीय आपदा, लेकिन केदारनाथ हादसे से सभी आज तक घायल हैं।
वो जिनके परिवार वाले उस आपदा का शिकार हुए, वो जो उन्हे बचाने
में शहीद हुए, वो जिन्हे वहां बार-बार दौरा करने जाना पड़ता है,
वो जो मारे गए लोगों की गिनती को कम करके दिखाने की टेंशन में घुले चले
जा रहे हैं, वो नेता जो लाशों पर सियासत कर रहे हैं और वो भी
केदारनाथ दर्शन की इच्छा रखते हैं। डर सबके मन में हैं, कहीं
फिर से किसी और पहाड़ी तीर्थस्थल पर ऐसा हो गया, तो क्या होगा
? लेकिन क्या कभी उन लोगों
के बारे में सोचा जो पहाड़ों को बसाए हुए हैं। हां हां माना कि अब आपके मन में ये आएगा
कि ये खुद पहाड़ी है तो पैरवी करने लगेगा, लेकिन सच ये है कि मेरे अलावा और कौन बताएगा।
मैं केदारनाथ त्रासदी की
बात नहीं करना चाहता, लेकिन
आप ये बताइए, कि केदारनाथ औऱ उसके अलावा पहाड़ों पर छुट्टियां
मनाने के लिए जाने वाले कितने लोग पहाड़ों पर घर बसाना चाहेंगे? शायद आप में से कुछ दिलेर हां भी कह दें, यहां मैं पैसे वाली पार्टियों की बात
नहीं कर रहा हूं, जो वहां एक कॉटेज बना कर नौकर चाकर रखकर गर्मियों
की छुट्टियों के लिए जाने की सोचते हैं। बात है, पहाड़ बसाने
की। क्या आपको लगता है कि मस्त सुहाने मौसम वाले, आंखों को सुखमय
दृश्य देने वाले, ठंडी हवाओं से दैवीय सुख पहुंचाने वाले और आरओ
के जमाने में पत्तों, पेड़ों की जड़ों, चश्मों और झरनों से मिनरल वॉटर देने वाले पहाड़ों पर बसना दुनिया का सबसे आसान
काम है। पहाड़ों पर खेती करने के लिए पहाड़ों को खेतीनुमा बनाना होता है। एक पहाड़
को सीढ़ीनुमा खेतों में बदलने में एक पूरी पीढ़ी अपना जीवन लगा देती है। जिसके बाद
की पीढ़ियां उन खेतों पर नीचे बहने वाली नदी से पानी भर-भर कर सींचती हैं। वो भी अगर
आसपास नदी हो तो। जहां पीने के पानी के लिए दिनभर पेड़ों की जड़ों से टिप-टिप करके
गिरी बूंदों का संग्रह करके जुगाड़ किया जाता हो, वहां खेती कितनी
आसान होती होगी, अंदाजा लगा लीजिए। खेती के लिए मेघा के बरसने
का इंतजार करना होता है, जो कभी कम कभी ज्यादा बरसते हैं। ग्लोबल
वार्मिंग का मतलब भी नहीं जानने वाले गांववालों को ये पता है कि इस बला को लाने में
उनका कोई हाथ नहीं है, औऱ जिसका हाथ है, उसे फर्क भी नहीं पड़ता। खैर बादल कम बरसे तो खाने के लाले पड़ेंगें औऱ भूखों
मरने की नौबत आ जाएगी, औऱ अगर बादल बरसे तो? अगर बादल नॉर्मल पानी बरसाने लगें तो भी गांववालों के
लिए बाढ़ सा माहौल होता है, लगातार
पानी बरसने से पीढियों की मेहनत से बनाए गए खेतों की मिट्टी कटने लगती है, घरों के बीच में से एकाएक चश्मा फूट पड़ता है, पहाड़ी
नदी अपने पूरे जोर औऱ शोर में बहने लगती है, सड़क से हर संपर्क
कट जाता है। और बादल फटने पर क्या होता
है, वो तो अब आप सभी जानते हैं,
पहले केवल हम जानते थे।
मेरे कई रिश्तेदारों औऱ
जानकारों ने बताया है कि किस तरह से जब वो एक बार सड़क से अपने गांव जा रहे थे तो उनके
सामने से अचानक पत्थर बरसने लगे, फिर सैलाब सा पानी आय़ा औऱ उसें घर, लोग, जानवर सब बहते हुए उन्होने देखे। वो अपनी जान बख्शने के लिए भगवान का शुक्रिया
करते नहीं थकते। गांव के गांव पहले भी इस आपदा से बर्बाद हो चुके हैं। लेकिन किसी को
पता तक नहीं चला, प्रशासन को इस बात की जानकारी दी गई,
तो कार्रवाई के नाम पर तारीख मिलीं। पहाड़ी भोले-भाले होते हैं ये कहने
वाले सभी लोगों को आज मैं ये बता दूं कि अब इसे गाली मानना चाहिए ना कि एक तमगा,
क्योंकि इसी वजह से आज तक उनकी पीढ़ियों की मेहनत से बसाए पहाड़ों का
दोहन होता आया है औऱ उनका हक आज तक उन्हे नहीं मिला।
मेरे अपने गांव पोखारू
(खंद्वारी), इड़ियाकोट, पौढ़ी गढ़वाल में पीने के पानी का ऐसे ही इंतजाम होता है। गांव तक जाने के
लिए सड़क की कल्पना लिए मेरे दादाजी चल बसे, अबतक भी गांव से
सड़क कोसों दूर है, बस पहुंचने ही वाली है, कब तक पहुंचेगी ये सरकारी चाल पर निर्भर है। पानी के लिए इंतजाम किए जाएंगे,
ये भी एक चुनावी वादा है, अभी ग्राम प्रधान चुनाव
में हमारे गांव से वोट मांगने वाले हर किसी के पास यही एक मुद्दा था। बिजली पहुंचे
हुए कुछ साल हुए हैं। पढ़ाई के नाम पर नई पीढ़ी को केवल स्कूल मिले हैं, वो भई कुछ खुशनसीब गांवों को, बाकी गांवों में अच्छे
नहीं, स्कूल नहीं हैं, मीलों दूर चलकर स्कूल
जाने वाले थके बच्चे से आप किस पढ़ाई की उम्मीद करते हैं। क्या कभी भविष्य के बारे
में सोचने का समय भी मिलता होगा उन बच्चों को? वो बच्चे जो घर में पहले सुबह उठकर पहाड़ के नीचे से
पानी ढोकर ऊपर लाएगा, फिर तीन-चार
पहाड़ पार करके पढ़ने जाएगा, घर में खेती कम होने की वजह से एक
ही रोटी में गुजारा करेगा औऱ फिर वापस तीन-चटार पहाड़ चढ़कर आएगा, फिर मवेशी चराने उतनी ही दूरले जाएगा औऱ फिर पानी भरकर रात को घर लाएगा,
उसे रात को एक रोटी खाकर आधा पेट भरा होने पर थकान से नींद भले आ जाती
हो लेकिन सपना शायद ही कोई आता हो। कहते हैं सुबह के सपने सच होते हैं, लेकिन उसे तो सुबह उठकर पानी लाने जाना होता है, सपने
कहां से आएंगे। औऱ उसके बाद पढ़ाई का स्तर देखकर दिल्ली का कोई भी पांचवीं पास बच्चा
बारहवीं के बच्चे को कॉम्प्लेक्स दे देगा। उसपर आजाद भारत में सम्मान
से जीने की जरूरत बन चुकी अंग्रेजी की ABCD पांचवी के बच्चों के लिए भी हव्वा बनी रहती है। औऱ फिर
सरकार कहती है बच्चे कल का भविष्य हैं, शायद वो दिल्ली औऱ महानगरों में रहनेवाले बच्चों की बात करती होगी।
सरकार कहती है, कि उसने पहाड़ों को बहुत कुछ दिया है,
सड़कें दी हैं, जो हर साल पानी में बह जाती हैं
या टूट जाती हैं, धमाकों से बनाईं सड़कों के ऊपर औऱ नीचे का हिस्सा
कमजोर होता होगा, शायद इसीलिए कुछ बरसातों के बाद पूरा का पूरा
ही गिर पड़ता है। फिर आती है स्कूलों की बात, उसका स्तर औऱ दूरी
मैनें आपको बता ही दी। अस्पताल कई किलोमीटर दूर हैं, जहां डॉक्टरों
की कमी है क्योंकि सभी MBBS अपनी सालों की मेहनत के बाद कुछ कमाना चाहते हैं, काश कि पहाड़ी बच्चों को पढ़ाई का वो
स्तर मिलता कि वो डॉक्टर बनते और फिर वहीं अपने घर पर रहते औऱ क्लीनिक चलाते । खैर 108 नंबर मिलाने पर ऐंबुलेंस आती है, पर जितनी देर में वो आती है,
तबतक यमदूत मरीज के साथ उसके एक-आध परिवार वाले की जान भी लेकर अपने
दूसरे असाइनमेंट पर निकल चुके होते होंगे। इसबार एक नई चीज देखने को मिली वो है मनरेगा
का काम, हमारे गांव तक भी पहुंच चुकी है मनरेगा स्कीम। लेकिन
हद देखिए कि गांववालों से पहाड़ों पर सरकारी ठेकेदार मनरेगा मजदूरी के नाम पर बिना
प्लानिंग के कहीं भी खुदाई करवाते हैं, जगह-जगह बिन बात के खुदे
दिखते हैं पहाड़। अरे भई हर पहाड़ के लिए उसकी बनावट, वहां के
गांव की जरूरत के हिसाब से कोई योजना बनाकर फिर उनसे मजदूरी करवा लो। औऱ फिर मजदूरी
के पैसे की बांट में बंदरबांट कहां किसी से छिपी है, सुना है
अब सीधे अकाउंट में जाया करेंगे मजदूरी के पैसे, इससे कोई धांधली
नहीं होगी। कितनी भोली है हमारे देश की सरकार।
इसके अलावा, दारू-शराब-मदिरा अलग-अलग नामों से पुकारे
जाने वाले अमृत की पहाड़ों की दुर्गति में भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। जितना
डर गांव को जंगली-जानवरों से अपने मवेशियों औऱ खेती
का होता है, उतना ही अपने हताश बच्चों के
शराब की लत में डूबने का भी।
सवाल है बिन पानी के खेती
कैसे होगी, बिन खेती के खाना कैसे होगा,
बिन अनाज के पैसा कहां से आएगा ? बिन स्कूल के शिक्षा कैसे
मिलेगी, बिन स्तर की शिक्षा से कॉम्पिटीशन
कैसे पास होगा, बिन इंग्लिश के नौकरी कैसे मिलेगी, बिन नौकरी के पैसे कैसे मिलेंगे ?
सवाल पैसे का है, जिसके लिए पूरी दुनिया जो पहले अपनी
गति से घूमती थी अब तेज घुमाई जा रही है। तो पैसे के लिए गांव से पलायन हो रहे हैं,
लोग पहाड़ छोड़कर दिल्ली आ रहे हैं, छोटे मोटे काम करने।
तो अगली बार कुल्लू-मनाली, शिमला, रोहतांग,
मसूरी, लैंसडाउन या फिर किसी और पहाड़ पर घूमने
जाओ, तो गंदगी मत फैलाना और गौर से देखना उनकी चेहरे की मुस्कुराहट के पीछे की बेबसी को, जिसे अब वो तकदीर मानकर जिए जा रहे हैं,
शायद आज से महसूस करना शुरू करोगे तो कुछ सालों में पहाड़ों की सूरत
भी बदल जाए ।

prodigiously written :)
जवाब देंहटाएंi almost had a flashback of all my hill station trips :')