अंत में अनंत का आभास है श्मशान
“देखकर
खुद को फिरे है इतराता
ख़ुदा तेरी
मिट्टी में खुदी कितनी है”
निगमबोध घाट पर
चिताओं को जलते देखकर कई तरह की बातें मन में आ गईं। जिसे न पसंद हो न पढ़े। पर,
साझा करने का मन है।
जितनी बार श्मशान से
लौटता हूं, सब झूठा लगने लगता है,
अपने से चालाक औऱ ज़िंदगी में मारकाट की
प्रतियोगिता में पारंगत महान व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति बढ़ जाती है। क्या
इनका यह फ़न चिता को चकमा देने में काम आएगा।
अनंत सुख देने वाला
यह जीवन, जिसमें हल्की सी ज्यादा
गर्मी से पसीने औऱ गर्म चीज़ से कई दिनों तक जलन औऱ फिर जलने का दाग रह जाता है,
विडंबना यह कि उस जीवन को मुक्ति का
मार्ग उसी आग्नि से मिलता है, फिर
आजीवन जिंदगी देने वाले पानी में डूबने को छोड़ दी जाती हैं बची अस्थियां। सब कुछ
शांत है। शिव भी शांत बैठे हैं।
आपाधापी के बीच अजीब
सी शांति का अनुभव है श्मशान। कल किसी ने मुझसे औकात का प्रश्न किया, सच में सबकी औकात कुछ क्विंटल लकड़ी ही है।
फिर भी बहुत कुछ चाहिए सभी को. जिसको नहीं चाहिए उसे भी इसी दौड़ में रहना पड़ता
है, नहीं तो उड़ते परिंदे के पर
गिन लेने वाले कई महाज्ञानी उसे कमज़ोर, कायर और कामचोर की संज्ञा देने लगते हैं, कई देखें हैं मैने अबतक। समय का फ़ेर है, किसी का अथाह धन उसकी मौत का कारण बनता है,
तो किसी की अंतहीन गरीबी। ज़िदगी नज़दीक
से दगा देती है।
हम हर चीज़ में अपने
लिए सोचते हैं, जब प्यार नहीं
होता तो प्यार, जब धन नहीं होता
तो धन औऱ ऐसे में हर संभव कोशिश करते हैं कि किसी तरह से वो वांछित चीज़ मिल जाए।
सबको सबकुछ नहीं मिलता, पर कुछ
को जब मिल जाता है तो, देने वाले
को साइड कर देते हैं, देने वाला
कोई भी हो सकता है, किसी को भी
साधन बनाया जाता है, आपकी खुशी
के लिए, पर यहां सुख मिला नहीं
कि, हम फिर से अपनी मैं पर वापस
आ जाते हैं। क्या करना चाहिए, क्या
होना चाहिए ये सब जब खुद पर पड़ती है तो ही समझ में आता है। क्योंकि अंत के बाद तो
आपको अपने भी सूर्यास्त से पहले फूंक देना चाहते हैं... क्यों... बदबू आती है
मुर्दे से, इसलिए। पाने पर हर
बार खुद को खुशकिस्मत महसूस करता हूं, पर खोने पर चिता याद आती है, क्योंकि वहां जाते वक्त कुछ या कोई साथ नहीं जाता।
हर बार श्मशान से
लौटने के बाद अपने अंदर खालीपन महसूस करने लगता हूं। लोग कहते हैं कि यही श्मशान
वैराग्य है। यह कैसा वैराग है समझ में नहीं आता। पर हंसती खेलती ज़िंदगी का यूं
कुछ घंटों में ही भस्म हो जाना मुझे डरा देता है। इसके बाद जिन लोगों से प्यार
करता हूं, उनसे और लगाव होने
लगता है। गलती अपनी हो या किसी और की, हर बार मौत से छोटी लगने लगती है। क्योंकि मैं हूं, तुम हो, तो ये सब है। अब लगता है कि इतनी मेहनत-मशक्कत, भाग-दौड़ किसके लिए?
वर्ना.... कल सिर्फ धूल बचेगी, मेरी चिता की
राख हो...या तेरी कब्र की मिट्टी।

कया बोलू? नि शबद ,इसे केवल महसूस कर रही हू!
जवाब देंहटाएंये ऐसा सवाल है जिस पे जितना लिखा जाए ,उतने सवाल पैदा होता है और जवाब वही शूनय लेकिन इससे इंसान की मानसिक ऊंचाई का थाह जरूर लगता है।ये सोच ईंसानियत की अहम demand होती है ।बधाई इस उचाई के लिए लेकिन इस ऊंचाई के बाद जीना बहुत बड़ा challenge हो जाता है।
जवाब देंहटाएंबेहतरिन शबद शिलप
जवाब देंहटाएंbahut khoob.bahut alag topic par likha hai.yeh mehnat,musshakkat bhag-daur apne karmon ke liye ,isliye apne karam kiye jao.
जवाब देंहटाएंThankyou Auntyji, you took out time to read and comment on it. Desperately waiting for your Blog
हटाएंSIR Behad khoobsoorat..����
जवाब देंहटाएंधन्यवाद राघव.. पढने के लिए
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएं