और उसने मेरी गोद में दम तोड़ दिया.....
मुझे आज भी याद है, तकरीबन सात साल पहले जनवरी के महीने में, जब पहली बार उसको देखा, तो मन में आया कि काश ये मेरे पास होता। अब तक की ज़िंदगी में ऐसा पहली बार लगा, ये बोलकर मैं झूठमूठ ही इमोशनल लाइन नहीं जोडना चाहता। लेकिन उस प्यारे से गोलमोल छोटे सफेद रंग के भूटिया पिल्ले को देखकर, बस मन किया कि ले चलो।
गांव की हसीन वादियों में स्वच्छंद विचरने पर मैं खुद को आज़ाद महसूस करने लगता हूं। मैं मूल-रूप से उत्तराखंड का निवासी हूं, जिसे उत्तरांचल ज्यादा पसंद था। प्रकुति के समीप पहुंचते ही अचानक स्वर्ग सी अनुभूति होने लगती है। बरबस ही मन होता है, कि काश.... इस मनोरम अहसास का एक हिस्सा मैं अपनी राजधानी की आपाधापी के बीच ले जा सकूं। पर कुछ चित्रों और अपनी दिमाग़ की नसों में समेटी कुछ यादों के सिवा ले जा नहीं पाता था। तो इस बार मौका मिला, और मैं अपनी जैकेट के अंदर उस कुत्ते के पिल्ले को डालकर चुपचाप अपनी गाडी तक चल दिया।
मैं जानता था, कि कुत्ता शब्द से ही घर में भूचाल आ जाता है, तो फिर गांव से एक कुत्ते को घर तक ले जाने की इजाजत तो मुझे स्वयं भगवान भी नहीं दिला सकते।
मम्मी को कुत्तों से घिन आती थी, तो छुटकी को डर लगता था औऱ पिताजी, वो सबकी खुशी में खुश रहते हैं। तो, मैं अपनी शैतानी प्रवृत्ति के अनुसार चाल चल चुका था। चुपाचाप ड्राइविंग सीट के नीचे खिसका कर, मैं वहीं बैठ गया। सब आने ही वाले थे, घर निकलने का समय हो चुका था और मैं अपना भांडा औऱ सिर नहीं फुडवाना चाहता था। इसलिए अंदर से ही सबको बाय की, औऱ चल दी हमारी गाडी, दिल्ली की ओर।
दिल्ली वैसे ही काफी दूर है, उस दिन औऱ दूर लग रही थी। सब सो गए थे, कि अचानक गुडिया चिल्लाई, "मम्मी गाडी में चूहा है।" बस, फिर क्या था, फूट गया भांडा। सबको पता था, कि कौन है इसका ज़िम्मेदार। मम्मी शुरू हो गईं, गांव काफी पीछे छूट चुका था। तो मैनें नाराज होते हुए कह दिया कि अगर आपका मन नहीं है, तो वापस गांव छोड आते हैं। रास्ते में छोड नहीं सकते इतने छोटे बच्चे को, वापस जाना मुनासिब नहीं था। तो कुत्ता अब साथ ही रहेगा।
अब मैने गाडी में ही, अपने बेटे का नामकरण कर दिया। बूज़ो, जी हां, यही नाम रखा उसका। मेरी कॉलेज की एक मित्र निष्ठा के कुत्ते का नाम था बूजो और वही नाम दिया मैने उसे। इतना प्यारा पिल्ला था कि घर पहुंचते ही, जब गली में मैने शान से उसकी नुमाइश की, तो लगे ऑर्डर पर ऑर्डर मिलने। हमारे लिए भी ले आना अगली बार एक पिल्ला अपने गांव से। औऱ मेरी जिम करी हुई चौडी छाती और चौडी हो गई।
पहली रात तो उसने मेरी बैंड बजा दी। मां कसम, रात भर कूं कूं कूं कूं.... नींद में उसने चरस बो दी। हर 1 घंटे में मैं और वो सडक पर। पता नहीं इतनी सूसू ये पिल्ले लाते कहां से हैं। अबे एक बार करो सूसू-पॉटी औऱ बस बाकी काम सुबह करेंगे। पर वो कहां मानने वाला था, करता रहा रात भर कूं कूं औऱ सू सू। साले ने घर में पॉटी कर के मुझसे वो भी साफ करवा दी। भई एक बार को तो लगा, कि गलती कर दी। लेकिन सच कहूं, ये गलती सबको एक बार करनी जरूर चाहिए। शादी की गलती तो साली गलती ही निकलती है, पर कुत्ता पाल लोगे, तो शर्त लगा कर कह सकता हूं, कि प्यार का असली मतलब समझ आ जाएगा।
पिताजी का कॉलेस्ट्रॉल बढने के बाद से ही, मैं रोज उन्हे सुबह वॉक करने के निए उठाता, और वो चाय पर चाय चिल्लाते औऱ अखबार के साथ अपनी दिनचर्या शुरू करते। लेकिन अब जब मेरा बूज़ो बडा हो गया, तो पापा के बिस्तर के पास जाकर प्यार से कूंकूं करता औऱ... कितना भी झिडक लो, डांट लो, मार लो, वो फिर प्यार से कान चाटकर कूंकूं करेगा। थक हारकर पापा को सुबह बूजो की वजह से मॉर्निंग वॉक की अदत पड ही गई।
मम्मी को भी उसने मम्मी का पल्लू पकड पकडकर अपनी आदत लगवा ही ली। अब हमारे हिस्से की आधी गालियां वो खा लेता था। सच कहूं तो कुछ गालियां उसकी वजह से भी पडती थीं, साला कुत्ता कहीं का। लेकिन घर में उसकी एंट्री के बाद से ही माहौल और खुशनुमा हो गया था। शाम को कॉलेज से आने के बाद मैं अपनी सैंडो डालकर बूजो को लेकर बाहर घूमना और लोगों के ऑर्डर बटोरना मुझे भी अच्छा लगता था।
अब अचानक अपने बूजो के जाने पर उसकी कमी खलती है। यार, मेरी बाइक गली के कोने में आते ही, उसकी पतली आवाज में भौंकने की आवाज शुरू हो जाती थी। घर में घुसने का टइम आपका कुछ भी हो, सुबह-शाम-आधी रात, वक्त भले बेवक्त हुआ हो, लेकिन घर में घुसते ही आपको अपने पूरे साजो सामान के साथ, हेलमेट भी नहीं उतारने की मोहलत देता था साला, चिल्लमचोट मचा कर मुहल्ला इकट्ठा न करदे, पापा न उठ जाएं, इसलि जमीन पर बैठकर उसे प्यार करना पडता था। और वो, इतना बडा औऱ भारी होने के बावजूद मेरी गोद में अपने बचपन की तरह समाने की कोशिश करता था। साला कुत्ता ही ठहरा, उसे शायद अपने साइज का अनुमान नहीं था...या शायद वो अपने प्यार के आगे अपने बडे और खूंखार व्यक्तित्व को भुला देता था। मटर के दाने के पीछे पागल होकर भागता था, मोमोज़ को कैच कर लेता था, हमसे ज्यादा मम्मी का आज्ञाकारी था, भइ मम्मी के बोलने पर भौंकना बंद कर देता था। इतना हो गया, कि हमे कुत्ते की मिसाल दी जाने लगी। बहुत ही शांत औऱ प्यारा कुत्ता था बूज़ो।
लेकिन यही शांति शायद उसे खा गई। चाणक्य ने कहा है, कि , "सांप भले ही विषैला न हो, पर उसे फन जरूर फैलाना चाहिए, इससे शिकारी उससे हमेशा डरते रहेंगे।" वही चूक हुई होगी शायद। वर्ना इतना तंदुरुस्त हो चुका था वो, कि मुझे लगा कि आलसी हो गया है। कोई कूंकूं नहीं की साले ने। यार, मौका भी नहीं दिया।
तीन दिन से बुखार इतना बढ गया था मेरा कि छुट्टी मारनी ही पडी। ब्लड टेस्ट करवाया तो पता चला इनफेक्शन औऱ वायरल बढ गया है। खुद डॉक्टर को दिखाने गया तो उसके लिए भी बुखार की दवा ले गया। उसको खिलाई दवाई औऱ लगा कि हर बार की तरह सुबह आकर हाथ चाटेगा। पर, रात में ही गुडिया ने जगाया, कि बूजो की तबियत बिगडती जा रही है। मैं उठकर गया तो उसका आधा शरीर पथरा चुका था। मैनें पुचकारा तो उसने अपने पुराने तरीके से अपनी पलकें झपकाईं और जीभ दो बार बाहर निकालीं। थोडा पानी पिलाया, तो उसकी सांसे तेज हो गईं, बुखार से तप रहा था मेरा बेटा। मैंने उससे कहा भी, कि सुबह तक संभाल ले, डॉक्टर के पास ले चलूंगा। पर साला, जिद्दी कहींका, नहीम माना।
उसका बुखार बढ गया, सांसें तेज होती चली गईं। सोफे से उतार कर उसको जमीन पर कालीन के ऊपर लेटा दिया। औऱ 10:30 से 12:30 के बीच, उसका सिर औऱ छाती सहलाता रहा मैं, बार-बार उसकी पूंछ की ओर देखता कि साला कोई मूवमेट करे, तो लगे कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन मम्मी उसके लिए तुलसी के पत्ते लाईं औऱ वो उसके मूंह में डाल दिए। थोडी देर बाद पानी पिलाया औऱ उसने मेरे हाथों में ही अपना दम तोड़ दिया।
मेरा प्यारा कुत्ता, सात साल का हो जाता इस 25 दिसंबर को, केक लाता उसके लिए, पर बीच में ही छोडकर चला गया। रात भर जागे रही मम्मी, मैं 2:30 बजे सो गया था। सुबह 5 बजे उठकर पापा को बताया। अपने दोस्त अमल को फोन किया। अपने बेटे की लाश को उठाया औऱ गाडी में रखा। अमल को लिया, नमक लिया औऱ यमुना के किनारे पहुंच गया उसे लेकर।
यमुना के किनारे लोग अपने बच्चों को दफनाते हैं, एक मजदूर को कहा तो उसने किसी को भेजा। उसने खुदाई की औऱ फिर उसमें मैने अपने बूजों को लेटा दिया। इतना नर्म हो गया था वो, कि लगा कि कहीं ठीक तो नहीं हो गया। थोडा सहलाया, उसकी आंखें देखी, पर उसने कुछ नहीं किया, नहीं हिला। फिर मैने उसपर सात किलो नमक डाला, सफेद नमक की चादर डालकर फिर मिट्टी डाली। साला, बच्चा था, तो मैं उसे गड्ढे में गिरा देता था, औऱ जोर से भागता था, थोजी कोशिश के बाद वो बाहर निकलता औऱ अपने कान पीछे कर, जीभ निकालकर मेरी तरफ तेजी से दौडता था। पर इस बार दब मैं चाहता था, कि वो आए, नहीं आया।
कौन कहता है कि कुत्ता आदमी का बेस्ट फ्रेंड होता है। बेस्ट फ्रेंड ऐसे किसी को बीच में छोडते हैं क्या।

isme us bechare ki kya galti use bhagwaan ne jeene k liye itne hi saal diye the
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