लडकी की लाश
कल रेलवे स्टेशन पर पडी लाश को देखकर मेरे मस्तिष्क में जैसे विचारों का ज्वारभाटा सा आ गया । पुलिस, लोग और मीडियाकर्मी अपने तर्क और बुद्धिमत्ता से हर संभव कडी तलाश रहे थे। मेरा इमोशनल मन था कि सोचने लगा, कि जो लाश कभी जिंदा लडकी थी, उसे वैलेंटाइनस -डे से पहले प्रोमिस डे के दिन उसी के किसी चाहने वाले ने मौत तोहफे में दे दी। चाहने वाला दोस्त, भाई, मां , बहन या बाप भी हो सकता है, लेकिन एक अर्से तक उसे प्यार कर फिर यूं सच का सामना "मौत" करा देने की क्या मजबूरी रही होगी। पौल्यूटिड इस एनवायरनमेंट में महापौल्यूटिड इंसानों का बेसिक इमोशन यानि प्यार, घमंड, ईर्ष्या, ज़िद और इज्जत के आगे हर रोज मेरे-तुम्हारे दिल ओ दिमाग के रेलवे स्टेशन पर एक काले बैग में जबर्दस्ती ठूंसी हुई लाश की तरह चुपचाप पडा रहता है। वहां न कोई पुलिस मुझसे पूछती है इस लाश का पता, न लोग शिनाख्त करते हैं और न ही कोई बुद्धिजीवी पत्रकार उस लाश पर सवाल कर बवाल खडे करता है। मैं लेकिन मरे और ज़िन्दा लोगों में ज्यादा फर्क अब नहीं कर पाता, सवाल करता तो हूं पर जवाब खुद भी ढूंढ नहीं पाता।
shabd bohot kam hain aur matlab bohot bada. keep it up
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंइस महादुष्ट इमोशंस के जिम्मेदार भी हम लोग ही हैं,जिन्होंने स्वयं को विषम परिस्थितियों के सम्मुख दूषित होने को छोड़ दिया है।
जवाब देंहटाएंवाह क्या हिंदी है.. हां सही कहा आपने.. स्वार्थी इंसान.. मतलब से ही सब करता है
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